धान और गेहूं की खेती छोड़ें, गेंदे की खेती से दिवाली और छठ पर करें बंपर कमाई बिहार एक घंटा पहले 3
शिवहर और सीतामढ़ी के किसानों के लिए गेंदे की खेती मुनाफा कमाने का शानदार मौका लेकर आई है। सही समय पर उन्नत किस्मों का चुनाव कर किसान दिवाली और छठ के दौरान भारी कमाई कर सकते हैं।

त्यौहारों के सीजन में गेंदे की खेती का महत्व

अगर आप पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं, तो गेंदे की खेती आपके लिए सबसे बेहतरीन विकल्प हो सकती है। शिवहर और सीतामढ़ी जैसे जिलों की जलवायु गेंदे की व्यावसायिक खेती के लिए अत्यंत अनुकूल है। भारत में पूजा-पाठ, बड़े त्यौहारों और शादी-विवाह के आयोजनों में गेंदे के फूलों की मांग हमेशा बनी रहती है। वर्तमान में स्थानीय बाजारों की आपूर्ति के लिए काफी हद तक पश्चिम बंगाल और अन्य पड़ोसी राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। दूसरे राज्यों से फूल मंगाने के कारण न केवल परिवहन पर अधिक खर्च होता है, बल्कि लंबी दूरी की यात्रा के कारण फूलों की ताजगी और गुणवत्ता भी कम हो जाती है। यदि स्थानीय किसान इस ओर कदम बढ़ाएं, तो वे न केवल इन खर्चों को बचा सकते हैं बल्कि बाजार में बेहतर दाम भी प्राप्त कर सकते हैं।

कृषि वैज्ञानिकों की राय और उन्नत किस्में

कृषि विज्ञान केंद्र शिवहर की उद्यान वैज्ञानिक संचिता घोष के अनुसार, गेंदे की खेती के लिए क्षेत्र में कई बेहतरीन उन्नत प्रजातियां उपलब्ध हैं जो किसानों को मालामाल कर सकती हैं। इन प्रमुख किस्मों में पूसा नारंगी, पूसा बसंती, पूसा अर्पिता और सिरकोल शामिल हैं। वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि किसान भाई अपनी बाजार की मांग और व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार किस्म का चयन करें। उदाहरण के लिए, सिरकोल प्रजाति इस इलाके की जलवायु के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिसे आसानी से कटिंग विधि से लगाया जा सकता है। वहीं, पूसा नारंगी और पूसा बसंती जैसी किस्मों को उगाने के लिए बीजों से पहले पौध तैयार करनी पड़ती है। सही किस्म का चुनाव ही फसल की उच्च गुणवत्ता का आधार बनता है।

सही समय और दिवाली-छठ पर मुनाफा

गेंदे की खेती में सफलता पाने के लिए रोपाई का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार, अगस्त और सितंबर का महीना गेंदे के पौधे लगाने के लिए सबसे उपयुक्त समय है। इस अवधि में जो फसल लगाई जाती है, उसमें दशहरा, दिवाली और छठ पूजा के दौरान फूल पूरी तरह से खिलकर तैयार हो जाते हैं। त्यौहारों के सीजन में गेंदे की मांग आसमान छूने लगती है, जिससे किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य मिलता है। किसान इन फूलों को सीधे बाजार में खुले तौर पर या फिर लड़ी बनाकर बेच सकते हैं। दिवाली और छठ जैसे बड़े आयोजनों के समय एक कुड़ी, जिसमें लगभग 20 लड़ी होती हैं, का भाव 450 रुपये से लेकर 700 रुपये तक पहुंच जाता है। यह आमदनी पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक होती है।

सालाना कमाई के लिए सही प्रबंधन

गेंदे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी खेती पूरे 12 महीने की जा सकती है। सावन के महीने में फूलों की मांग को देखते हुए मार्च और अप्रैल में बुवाई की जाती है। वहीं, शीतकालीन सीजन की भारी मांग को पूरा करने के लिए अगस्त-सितंबर में रोपाई सबसे अधिक लाभदायक साबित होती है। किसानों को अपनी फसल चक्र और कैलेंडर को ध्यान में रखते हुए खेती की योजना बनानी चाहिए। धान और गेहूं के साथ-साथ गेंदा जैसी कैश क्रॉप और बागवानी फसलों को अपनाना आज के दौर में बहुत जरूरी हो गया है। थोड़ी सी मेहनत, सही तकनीक और बेहतर प्रबंधन के साथ स्थानीय किसान न केवल अपनी आय को बढ़ा सकते हैं, बल्कि खेती को एक लाभदायक व्यवसाय के रूप में भी स्थापित कर सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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