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एक घंटा पहले
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चीन का कड़ा प्रहार और अमेरिकी कंपनियों पर प्रतिबंध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दुनिया भर के देशों, विशेषकर चीन पर जिस तरह के व्यापारिक हमले किए, उसका असर अब खुद अमेरिका पर ही उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। ट्रंप ने चीन के खिलाफ एक के बाद एक टैरिफ के चाबुक चलाए थे, लेकिन बीजिंग ने भी अब उन्हें उसी की भाषा में जवाब दिया है। चीन ने न केवल 6 प्रमुख अमेरिकी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है, बल्कि अमेरिका की ड्रोन्स सप्लाई चेन पर भी बड़ा प्रहार किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिका के लिए हालात 'गरीबी में आटा गीला' वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। ईरान और मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिकी सेना पहले ही हथियारों की भारी कमी से जूझ रही थी, और अब चीन द्वारा ड्रोन्स, स्पेयर पार्ट्स और संबंधित तकनीकी निर्यात पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने ट्रंप प्रशासन की रक्षा तैयारियों की कमर तोड़ दी है।
THAAD मिसाइलों का संकट और रक्षा बजट पर मार
हाल ही में सीएनएन की एक रिपोर्ट ने अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध की स्थिति में अमेरिका ने अपने थियेटर हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस, जिसे THAAD मिसाइल सिस्टम कहा जाता है, उसके लगभग 80 प्रतिशत इंटरसेप्टर का इस्तेमाल पहले ही कर लिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका के पास मौजूद एडवांस एयर डिफेंस मिसाइलों का भंडार खतरनाक स्तर तक सिमट चुका है। जब अमेरिका पहले से ही भारी रक्षा घाटे और हथियारों के स्टॉक खत्म होने से परेशान है, तब चीन ने ड्रोन्स के पुर्जों और रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई रोककर जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। अब न तो अमेरिका के पास मिसाइलों का पर्याप्त बैकअप बचा है और न ही भविष्य में नए ड्रोन्स बनाने के लिए चीनी कलपुर्जों की उपलब्धता सुनिश्चित है।
ड्रोन निर्माण और अमेरिकी सैन्य क्षमता पर तीन बड़े झटके
ईरान और उसके सहयोगी गुटों के खिलाफ अमेरिका जिस तरह से एक पूर्ण युद्ध की स्थिति में है, उसमें उनकी सबसे बड़ी ताकत उनके हाई-टेक सर्विलांस और अटैक ड्रोन्स हैं। चीन के इस आर्थिक और तकनीकी हमले से अमेरिकी सेना को तीन बड़े घातक झटके लगे हैं:
- ड्रोन निर्माण और मेंटीनेंस ठप: अमेरिकी रक्षा उद्योग अपने छोटे जासूसी और कॉम्बैट ड्रोन्स के लिए काफी हद तक चीनी पार्ट्स जैसे कि मोटर, हाई-कैपेसिटी बैटरी, एडवांस्ड सेंसर और रेयर अर्थ मैग्नेट पर निर्भर है। सप्लाई रुकने से नए ड्रोन बनाना तो दूर, पुराने ड्रोन्स को चालू हालत में रखना भी पेंटागन के लिए एक कठिन चुनौती बन गया है।
- मिडिल ईस्ट में बढ़ी युद्ध लागत: ईरान और हूतियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने और सटीक हमले करने के लिए अमेरिकी सेना को प्रतिदिन दर्जनों ड्रोन्स की आवश्यकता होती है। चीनी प्रतिबंधों के कारण पार्ट्स की भारी किल्लत हो गई है, जिससे जंग लड़ने का खर्च कई गुना बढ़ गया है।
- डिफेंस सप्लाई चेन ध्वस्त: अमेरिका ब्लू यूएएस जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए चीनी पार्ट्स पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घरेलू उत्पादन क्षमता इतनी नहीं है कि वह रातों-रात चीन का स्थान ले सके। इस अचानक आए झटके से सेना का बैकअप सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है।
ट्रंप की नीतियां बनीं तनाव का मुख्य कारण
आखिर चीन ने इतना आक्रामक रुख क्यों अपनाया? इसके पीछे डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां सबसे बड़ा कारण हैं। पदभार संभालते ही ट्रंप ने चीन समेत 59 देशों से आयात होने वाले सामान पर नए टैरिफ लगाने का ऐलान किया। ट्रंप का तर्क था कि पुराने व्यापारिक समझौते अमेरिका के लिए घाटे का सौदा रहे हैं और वह उन्हें नए सिरे से अपने पक्ष में लिखना चाहते हैं। जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ पुराने व्यापारिक शुल्कों को रद्द कर दिया, तो ट्रंप प्रशासन ने 10 प्रतिशत का अंतरिम टैरिफ लगा दिया। समय सीमा खत्म होने पर शिनजियांग प्रांत में बंधुआ मजदूरी और मानवाधिकारों का हवाला देकर चीनी उत्पादों पर और कड़े टैक्स लगा दिए गए, जिससे चीन का सब्र का बांध टूट गया।
ब्लैकलिस्ट की गई कंपनियां और सुरक्षा जांच
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका की मनमानी ने उसके हितों पर सीधा चोट की है, जिसका जवाब देना आवश्यक था। चीन ने एप्लाइड डीएनए साइंसेज और स्ट्रैटम रिजरवायर समेत 6 बड़ी अमेरिकी कंपनियों को अपनी ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है। इसके परिणामस्वरूप अब कोई भी चीनी नागरिक या संस्थान इन कंपनियों के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। चीन का आरोप है कि इन कंपनियों ने शिनजियांग के मुद्दे पर वाशिंगटन द्वारा लगाए गए गैर-कानूनी प्रतिबंधों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके अलावा, चीन ने अमेरिका से आने वाले ऑफिस प्रिंटर और कॉपियर मशीनों की राष्ट्रीय सुरक्षा जांच शुरू कर दी है, ताकि किसी भी संभावित जासूसी को रोका जा सके।
मानवाधिकार विवाद और कूटनीतिक तनातनी
वाशिंगटन का दावा है कि शिनजियांग में उइगर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है, जिसमें जबरन मजदूरी भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र ने भी चीन के इन कदमों को मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में रखने की बात कही है। हालांकि, बीजिंग इन आरोपों को पूरी तरह नकारता रहा है। चीन का मानना है कि अमेरिका मानवाधिकारों का सहारा लेकर उसकी आर्थिक और तकनीकी तरक्की को रोकना चाहता है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि चीन के ट्रेड अफसर हे लिफेंग ने अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जमिएसन ग्रीर से फोन पर अपनी कड़ी नाराजगी दर्ज कराई है। चीन का यह भी आरोप है कि अमेरिका उसके रोबोटिक्स उद्योग को जानबूझकर बाधित करने की साजिश कर रहा है।
शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा पर छाया संकट
यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब दोनों देशों के रिश्तों में थोड़ी नरमी के संकेत मिल रहे थे। पिछले साल ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद ट्रेड वॉर की आग कुछ ठंडी पड़ती नजर आई थी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग को 24 सितंबर को ट्रंप के न्योते पर अमेरिका की सरकारी यात्रा पर जाना है। हालांकि, इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात से ठीक पहले इस नए ट्रेड और मिलिट्री वॉर ने माहौल में फिर से कड़वाहट घोल दी है। अब पूरी दुनिया इस पर टिकी है कि क्या सितंबर की बैठक में कोई समाधान निकल पाएगा, या फिर दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने के एजेंडे पर ही डटी रहेंगी।
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