छपरा का अनोखा बुढ़िया माई मंदिर: जहां पटरियों के बीच से गुजरती हैं ट्रेनें, रेलवे ने खुद कराया था निर्माण बिहार एक महीने पहले 81
बिहार के छपरा में स्थित बुढ़िया माई का मंदिर अपनी चमत्कारिक मान्यताओं और अनोखी स्थिति के कारण चर्चा में रहता है। यह मंदिर दो रेल पटरियों के ठीक बीच में बसा है, जहां से रोज तेज रफ्तार में ट्रेनें गुजरती हैं लेकिन आज तक कोई अनहोनी नहीं हुई है।

आस्था के आगे थमी ट्रेनों की रफ्तार

बिहार का छपरा जिला अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है, लेकिन यहाँ स्थित एक मंदिर देश भर में अपनी अनूठी स्थिति के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है। छपरा जंक्शन के पूर्वी छोर पर रेलखंड के उत्तर दिशा में स्थित यह मंदिर 'बुढ़िया माई मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह पवित्र स्थल दो रेल पटरियों के बीच स्थित है। यहाँ से प्रतिदिन दर्जनों ट्रेनें तेज रफ्तार में गुजरती हैं, लेकिन लोगों की अटूट आस्था के सामने विज्ञान और तकनीक भी नतमस्तक नजर आते हैं। आज तक इस मंदिर के पास कोई दुर्घटना नहीं हुई है, जिसे श्रद्धालु माता का ही आशीर्वाद मानते हैं।

पौराणिक कथा और मंदिर का इतिहास

स्थानीय लोगों की मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान बहुत पहले एक घना जंगल हुआ करता था। बहुत समय पहले एक बुजुर्ग महिला, जिन्हें लोग बुढ़िया माई कहते थे, यहाँ पीपल के पेड़ के नीचे अपना समय बिताती थीं। कहा जाता है कि वे छपरा जंक्शन पर उतरने वाले कोयले को एकत्र कर उसी से पीपल के पेड़ के नीचे अपना भोजन पकाती थीं और वहीं ईश्वर की भक्ति में लीन रहती थीं। एक दिन उनकी मृत्यु हो गई। उनकी बहन, जो नई बाजार मोहल्ले में रहती थीं, को जब इस घटना का आभास हुआ तो वह भागती हुई वहाँ पहुँची। बुढ़िया माई के शव को देखकर दुख के मारे उनकी बहन ने भी वहीं प्राण त्याग दिए। तब से ही यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाने लगा।

रेल विभाग के अधिकारी क्यों सहम गए थे?

इस मंदिर की महिमा तब और बढ़ गई जब रेलवे विभाग के अधिकारियों को अपनी गलती का एहसास हुआ। कहा जाता है कि जब रेलवे ने यहाँ छोटी रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था, तब एक रेल अधिकारी ने मंदिर परिसर में स्थित विशाल पीपल के पेड़ की एक डाल कटवा दी। जैसे ही वह डाल कटी, उस अधिकारी की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी और कुछ ही समय में उसकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे रेल महकमे में हड़कंप मचा दिया और हर कोई इस दैवीय चमत्कार से डर गया।

रेलवे ने खुद किया था मंदिर का निर्माण

अधिकारी की मौत के बाद, रेल प्रशासन ने उस स्थान के साथ छेड़छाड़ न करने का निर्णय लिया। रेलवे ने यहाँ माता के मंदिर का आधिकारिक रूप से निर्माण करवाया। रेलवे ने पास के एक गहरे तालाब को मिट्टी से भरकर वहां ट्रैक तो बिछा दिया, लेकिन बुढ़िया माई के मंदिर और उस विशाल पीपल के पेड़ को पूरी तरह सुरक्षित रखा। आज के समय में यहाँ बड़ी रेल लाइन भी सक्रिय है और दोनों ओर से ट्रेनें गुजरती हैं, लेकिन मंदिर अपनी जगह पर अडिग खड़ा है। रोजाना यहाँ हजारों श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं और सुरक्षित रूप से माता के दर्शन कर वापस लौटते हैं। यह स्थान आज भी आस्था और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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