समस्तीपुर में अनोखी पहल: बांस और मिथिला पेंटिंग से सजी राखियों में अब दिखेगी बिहार की गौरवशाली संस्कृति बिहार एक महीने पहले 73
समस्तीपुर के एक युवा कलाकार ने बांस की लकड़ी पर मिथिला पेंटिंग उकेरकर रक्षाबंधन के लिए विशेष राखियां तैयार की हैं। कलर ब्लाइंड होने के बावजूद अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे कुंदन कुमार रॉय की यह अनूठी पहल स्थानीय हस्तशिल्प और मिथिला संस्कृति को नई पहचान दिला रही है।

मिथिला कला का नया स्वरूप

रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। हर साल त्यौहार के नजदीक आते ही बाजार में आधुनिक शैली और नए डिजाइनों वाली राखियों की भरमार हो जाती है। लेकिन इस साल समस्तीपुर की धरती से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। समस्तीपुर के एक कलाकार ने बांस की लकड़ी का उपयोग करके मिथिला पेंटिंग वाली अनोखी राखियां बनाई हैं। ये राखियां केवल धागे और सजावट का सामान नहीं हैं, बल्कि इनमें मिथिलांचल की गहरी सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक लोक कला की स्पष्ट झलक मिलती है। बांस पर हाथ से उकेरी गई इन मिथिला पेंटिंग ने बाजार में मिल रही आम राखियों के बीच अपनी एक अलग और प्रभावशाली पहचान बना ली है।

बांस और संस्कृति का संगम

भारतीय परंपरा में बांस को काफी शुभ माना जाता है। इसे समृद्धि, निरंतरता और वंश वृद्धि का प्रतीक माना गया है। हमारे यहां विवाह से लेकर तमाम धार्मिक आयोजनों और शुभ कार्यों में बांस का उपयोग हमेशा से होता रहा है। इसी समृद्ध परंपरा को आधुनिक युग और त्यौहारों के साथ जोड़ते हुए, समस्तीपुर के रहने वाले युवा कलाकार कुंदन कुमार रॉय ने एक प्रयोग किया है। उन्होंने बांस की पतली और चिकनी लकड़ियों को काट कर उन्हें कला का कैनवास बनाया है। इन राखियों पर पारंपरिक फूल, पत्तियों, मछली, सूर्य, मोर और विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय आकृतियों को मिथिला शैली में बेहद बारीकी के साथ बनाया गया है। हस्तनिर्मित होने के कारण हर एक राखी दूसरे से अलग और अपनी खूबसूरती में बेजोड़ है।

वोकल फॉर लोकल और कलाकारों का हौसला

कुंदन कुमार रॉय का यह मानना है कि यह केवल राखी बनाने का काम नहीं है, बल्कि मिथिलांचल की संस्कृति को देश भर के लोगों तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है। उनका उद्देश्य है कि स्थानीय स्तर पर बने हस्तशिल्प और कला को अगर त्यौहारों के साथ जोड़ा जाए, तो इससे स्थानीय कलाकारों को न केवल रोजगार के नए अवसर मिलेंगे, बल्कि 'वोकल फॉर लोकल' का अभियान भी मजबूती के साथ आगे बढ़ेगा। उनकी यह इच्छा है कि इस बार रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाई की कलाई पर ऐसी राखियां बांधें जो भारतीय संस्कृति और मिथिला की कलात्मक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हों। स्थानीय लोग उनकी इस रचनात्मक पहल की जमकर तारीफ कर रहे हैं, जिसके कारण इन राखियों की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है।

दृढ़ संकल्प और कला की शक्ति

इस पूरी पहल के पीछे की सबसे प्रेरणादायक बात कुंदन कुमार रॉय का संघर्ष है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कुंदन खुद कलर ब्लाइंड होने की स्थिति का सामना कर रहे हैं। रंगों को पहचानने में होने वाली कठिनाई के बावजूद, उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और कला के प्रति समर्पण के दम पर इतनी सुंदर और आकर्षक राखियां तैयार की हैं जो हर किसी का मन मोह रही हैं। यह उदाहरण समाज के युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है कि यदि व्यक्ति का संकल्प मजबूत हो और मन में कुछ करने की इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी शारीरिक बाधा सफलता के रास्ते में कभी भी रोड़ा नहीं बन सकती। उनकी इस सफलता की कहानी आज कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

सांस्कृतिक विरासत का प्रसार

इन राखियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें केवल सजावट का तत्व नहीं है, बल्कि मिथिला की लोक संस्कृति पूरी तरह से जीवंत दिखाई देती है। पारंपरिक रंगों के तालमेल और आकृतियों से सजी ये राखियां भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को सीधे हमारी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही हैं। जो भी इन कलाकृतियों को देख रहा है, वह इनकी बारीकी और कलाकार की मेहनत की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पा रहा है। बाजार में मौजूद मशीन से बनी राखियों की चकाचौंध के बीच ये हस्तनिर्मित राखियां लोगों को अपनी जड़ों की याद दिला रही हैं।

निष्कर्ष

रक्षाबंधन का यह पर्व केवल प्रेम और वादे का ही नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी कला और अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ फिर से जुड़ने का भी एक शानदार अवसर है। समस्तीपुर के कुंदन कुमार रॉय की यह पहल साबित करती है कि अगर पारंपरिक कला को नए रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो वह न केवल स्थानीय बाजार में बल्कि देशभर में अपनी जगह बना सकती है। बांस की लकड़ी पर सजी मिथिला पेंटिंग वाली ये राखियां अब महज एक त्यौहार का प्रतीक नहीं रह गई हैं, बल्कि ये मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा का प्रतीक बन चुकी हैं। इस रक्षाबंधन, यह राखियां भाई-बहन के रिश्ते को एक नई सांस्कृतिक पहचान देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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