बिना तकनीक, बिना यंत्र: पुराने जमाने में कैसे होता था बारिश का अनुमान, जो आज भी निकलता है सच मध्य प्रदेश एक महीने पहले 24
मौसम विभाग और मोबाइल अलर्ट से पहले गांव के लोग पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों और बादलों के व्यवहार को देखकर बारिश का सटीक अनुमान लगा लेते थे। सागर जिले के 90 वर्षीय बुजुर्ग इस पुरानी परंपरा को याद करते हैं।

जैसे ही जून का महीना दस्तक देता है, मानसून और प्री-मानसून की हलचलें तेज होने लगती हैं। आज के दौर में बारिश, आंधी-तूफान और बिजली गिरने जैसी हर जानकारी मौसम विभाग, मोबाइल पर आने वाले अलर्ट और आधुनिक तकनीक के जरिए चंद पलों में लोगों तक पहुंच जाती है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब किसी वैज्ञानिक उपकरण के बिना भी ग्रामीण प्रकृति के संकेतों को पढ़कर मौसम का बेहद सटीक अंदाजा लगा लेते थे।

प्रकृति के संकेत ही थे पुराने जमाने का 'मौसम विभाग'

उस दौर में न कोई आधुनिक तकनीक थी और न ही कोई गणितीय सूत्र, फिर भी लोगों के अनुमान अक्सर सच साबित होते थे। आसपास की हलचलों पर बारीक नजर रखकर वे यह भांप लेते थे कि आने वाले दिनों में मौसम कैसा रहेगा। यही पारंपरिक समझ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही और आज भी कई बुजुर्ग इसे याद रखते हैं।

90 वर्षीय बुजुर्ग की जुबानी पुरानी परंपरा

सागर जिले के रहली निवासी 90 वर्षीय जीवन लाल उपाध्याय बताते हैं कि पहले के लोग पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों और बादलों के व्यवहार को ध्यान से देखकर बारिश का पूर्वानुमान लगाया करते थे। उनके अनुसार, प्रकृति के ये छोटे-छोटे इशारे ही उस जमाने में मौसम की भविष्यवाणी का सबसे भरोसेमंद आधार थे।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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