वीडीटीआर में बढ़ रहा लोमड़ियों का कुनबा, खेतों की बनीं बिना खर्च वाली रक्षक मध्य प्रदेश एक महीने पहले 71
वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में गांवों के विस्थापन से बने खुले जंगल में लोमड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। चूहे, टिड्डियां और सांप खाकर ये जीव किसानों की फसलों की मुफ्त में रखवाली कर रहे हैं।

कुछ दशक पहले तक गर्मियों की छुट्टियों में आंगन में खुले आसमान के नीचे दादा-दादी और नाना-नानी के साथ सोते हुए बच्चों को जो किस्से सुनने को मिलते थे, उनमें लोमड़ी अकसर एक खास किरदार होती थी। बच्चों की किताबों में जिन जानवरों का जिक्र आता था, उनमें भी यह चतुर प्राणी सबसे लोकप्रिय रहता था। लेकिन समय के साथ पैसों की होड़ में खेतों में पेस्टिसाइड का बेतहाशा छिड़काव बढ़ता गया और इसी वजह से लोमड़ी जैसे जीव धीरे-धीरे गायब होते चले गए। कभी फसलों के बीच लुका-छिपी खेलने वाली कुत्ता प्रजाति की यह सबसे छोटी सदस्य अब कठिन दौर से गुजर रही है।

वीडीटीआर से आई राहत भरी खबर

इन्हीं लोमड़ियों को लेकर मध्य प्रदेश के सबसे बड़े वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व से सुखद खबर सामने आ रही है। यहां बीते वर्षों में 40 से अधिक गांवों को विस्थापित किया गया, जिसके चलते खुला जंगल विकसित हुआ। लोमड़ी ऐसे ही खुले हैबिटेट में रहना पसंद करती है, लिहाजा उसे अनुकूल वातावरण मिला और उसकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

कई इलाकों में बरसों से नहीं दिखी लोमड़ी

वीडीटीआर के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार सिंह ने बताया कि नौरादेही का जंगल लोमड़ी के कुनबे के लिए बेहद मुफीद साबित हो रहा है। उनके मुताबिक मध्य प्रदेश के दूसरे टाइगर रिजर्व में लंबे समय से या बीते कई सालों से लोमड़ी नहीं देखी गई है, या यूं कहें कि वहां पाई ही नहीं जाती।

उन्होंने कहा कि इसे "छोटा पैकेट, बड़ा धमाका" कहा जा सकता है। भले ही लोग इन्हें देखने के लिए दीवाने न होते हों, लेकिन ये हमारे इकोसिस्टम के बेहतरीन पहरेदार हैं और किसानों के लिए वरदान साबित होते हैं। जो चूहे फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, लोमड़ी उन्हें खा जाती है। खेतों में किसानों के लिए सांपों का खतरा भी रहता है, और इन्हें भी यह आसानी से अपना शिकार बना लेती है। यानी इकोसिस्टम में इसका अहम योगदान रहा है।

खेती के बदलते तरीकों से उजड़ रहे ठिकाने

सिंह ने बताया कि आजकल जिस तरह की खेती हो रही है, उसमें पेस्टिसाइड का बोझ लगातार बढ़ रहा है और मशीनी उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है। इसकी वजह से लोमड़ी जिन बिलों (बरोज) में रहती है, वे या तो क्षतिग्रस्त हो जाते हैं या उनमें पेस्टिसाइड पहुंच जाता है, जिससे वे रहने लायक नहीं रह जाते। इन्हीं कारणों से ये जीव राजस्व क्षेत्र वाले इलाकों से दूर होते चले जा रहे हैं।

93 में से 40 गांवों का हो चुका विस्थापन

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व की बात करें तो पहले यहां 93 गांव हुआ करते थे, जिनमें से 40 गांवों का विस्थापन हो चुका है। यहां खुला जंगल और पुराने खेत हैं, यानी लोमड़ी को रहने के लिए जैसी जगह पसंद है, वैसा माहौल उसे मिल रहा है। इसके साथ ही यहां पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं होता, इसी वजह से बड़ी संख्या में लोमड़ियां घूमती हुई दिख रही हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

पर्यावरण और कृषि की मुफ्त रखवाली

लोमड़ी का पर्यावरण और कृषि तंत्र दोनों में अहम योगदान है। इसका मुख्य आहार चूहे, टिड्डियां और सांप हैं। ये वही जीव हैं जो किसानों की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। खेतों में चूहों की आबादी को नियंत्रित करके लोमड़ी बिना किसी खर्च के किसानों की फसलों की रक्षा करती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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