अटलांटिक की अथाह गहराई में मिली अनोखी दुनिया, जहां सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंचती विश्व एक घंटा पहले 1
अर्जेंटीना के पास दक्षिण अटलांटिक महासागर के घुप्प अंधेरे तल में वैज्ञानिकों ने वैटिकन सिटी जितनी बड़ी एक दुर्लभ कोरल रीफ खोजी है, जहां बिना धूप के केकड़े, ऑक्टोपस और जेलीफिश जैसे असंख्य जीव केमिकल्स के सहारे जिंदा हैं।

वैज्ञानिकों ने अब समुद्र के पाताल को खंगालना शुरू कर दिया है और इसी क्रम में उन्होंने एक ऐसा राज खोज निकाला है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। अर्जेंटीना के पास दक्षिण अटलांटिक महासागर के बिल्कुल घुप्प अंधेरे तल में एक जादुई और बेहद खूबसूरत दुनिया छिपी मिली है। यहां ऐसे कई नजारे सामने आए हैं, जिन्हें इंसानों ने पहले कभी नहीं देखा। हैरानी की बात यह है कि यह दुनिया धरती की तरह सूरज से नहीं, बल्कि एक खास व्यवस्था के सहारे चलती है। यहां सूरज की एक भी किरण नहीं पहुंचती, फिर भी एक पूरे देश जितनी बड़ी जीवंत दुनिया यहां बसी हुई है।

अंधेरे में बसी एक जीवंत दुनिया

समुद्र के बिल्कुल नीचे, जहां हर वक्त घना अंधेरा, बर्फीली ठंड और सन्नाटा पसरा रहता है, वहीं वैज्ञानिकों को एक अनोखा मंजर देखने को मिला। यह वह इलाका है जहां रोशनी कभी नहीं पहुंचती। जब वैज्ञानिकों ने अपना कैमरा नीचे भेजा तो उनके होश उड़ गए। वहां रेंगते हुए केकड़े, तारों जैसी दिखने वाली सी-स्टार्स, पानी में तैरती रहस्यमयी जेलीफिश और ऑक्टोपस का एक पूरा शहर आबाद था। इस रहस्यमयी दुनिया की सबसे बड़ी बुनियाद वहां मौजूद खास किस्म के कोरल हैं, जिन्होंने इस अंधेरे पाताल को जिंदगी से भर दिया है।

वैटिकन सिटी जितनी बड़ी रीफ: क्या है बैथेलिया कैंडिडा?

इस नई खोज में वैज्ञानिकों को जो सबसे अहम चीज मिली, वह है एक बेहद दुर्लभ गहरे पानी की कोरल रीफ, जिसे वे 'बैथेलिया कैंडिडा' कहते हैं। आमतौर पर हम जो मूंगे की चट्टानें देखते हैं, वे उथले और गर्म पानी में होती हैं। लेकिन बैथेलिया कैंडिडा एक ऐसा कोरल है जो बिना धूप के, गहरे और ठंडे पानी में अपना महल खड़ा करता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह आज तक खोजा गया बैथेलिया कैंडिडा का सबसे बड़ा इलाका है। यह पूरा क्षेत्र करीब 0.4 वर्ग किलोमीटर में फैला है। सीधे शब्दों में कहें तो यह दुनिया के सबसे छोटे देश 'वैटिकन सिटी' के बराबर है।

अमेरिका की लेहाई यूनिवर्सिटी के गहरे समुद्र के वैज्ञानिक सैंटियागो हेरेरा भी यह नजारा देखकर हैरान रह गए। उन्होंने बताया कि इससे पहले उन्होंने समंदर के अंदर ऐसी दुनिया नहीं देखी थी। हेरेरा ने कहा कि जैसे-जैसे हम समुद्र की गहराई में जाते हैं, वहां भोजन कम होता जाता है और इसलिए जीवों की संख्या भी घटने लगती है। ऐसे में अचानक इतने सारे जीवों को एक साथ एक सक्रिय दुनिया में देखना किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है।

धूप के बिना ये जीव जिंदा कैसे रहते हैं?

धरती पर ज्यादातर पेड़-पौधे और जीव सूरज की रोशनी से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर रहते हैं। लेकिन समुद्र के इस पाताल में कहानी बिल्कुल उलट है। यहां रहने वाले जीव जिंदा रहने के लिए 'केमोसिंथेसिस' का सहारा लेते हैं। यानी वे सूरज की रोशनी के बजाय समुद्र के नीचे मौजूद केमिकल और रसायनों से ऊर्जा बनाते हैं।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स: ये समुद्र की तलहटी में मौजूद ज्वालामुखी की दरारें होती हैं, जहां से बेहद गर्म पानी और तरह-तरह के रसायन बाहर निकलते हैं। जीव इसी केमिकल ऊर्जा से जिंदा रहते हैं।

कोल्ड सीप्स: ये वे जगहें होती हैं जहां समुद्र के नीचे मौजूद भंडारों से मीथेन और अन्य गैसें धीरे-धीरे पानी में रिसती रहती हैं। यहां रहने वाले बैक्टीरिया इसी गैस को खाकर जिंदा रहते हैं।

शामिट ओशन इंस्टीट्यूट के रिसर्च जहाज 'फाल्कोर' पर सवार वैज्ञानिक असल में इन्हीं मीथेन रिसने वाली जगहों की तलाश कर रहे थे। इसके लिए वे एक रिमोट से चलने वाले रोबोटिक व्हीकल 'सुबास्टियन' का इस्तेमाल कर रहे थे। लेकिन जैसे ही इस रोबोट का कैमरा नीचे गया, उन्हें मीथेन की जगह कोरल का विशालकाय साम्राज्य दिखाई दे गया।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्यूनस आयर्स की समुद्री वैज्ञानिक मारिया एमिलिया ब्रावो ने खुशी जताते हुए कहा कि अर्जेंटीना के गहरे समुद्र में जीवों की इतनी बड़ी तादाद और विविधता देखना एक सपने जैसा है। उन्होंने कहा कि हमने अपने देश की छिपी हुई खूबसूरती की सिर्फ एक खिड़की खोली है और अभी न जाने ऐसी कितनी खिड़कियां खोलनी बाकी हैं।

व्हेल की लाश और 'भूतिया' जेलीफिश

यह कोरल रीफ अपने आप में अनोखी तो है ही, लेकिन इस पूरे अभियान के दौरान वैज्ञानिकों को कुछ और चीजें भी मिलीं जिन्होंने उनके रोंगटे खड़े कर दिए। इस 900 किलोमीटर लंबे समुद्री रास्ते की जांच के दौरान वैज्ञानिकों को एक 'व्हेल फॉल' मिला। व्हेल फॉल का मतलब है किसी विशालकाय व्हेल मछली की मौत के बाद उसका शव जब बिल्कुल नीचे तलहटी में जाकर गिर जाता है। अर्जेंटीना के पानी में इतनी गहराई पर व्हेल फॉल मिलने की यह पहली घटना है।

यह करीब 3,890 मीटर की गहराई पर मिला, जहां अब सिर्फ उस विशालकाय व्हेल की हड्डियां बची हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि जब कोई व्हेल मरकर नीचे गिरती है तो उसका शरीर सालों, बल्कि दशकों तक वहां के छोटे-मोटे जीवों के लिए भोजन का भंडार बन जाता है। यह कंकाल भी शायद कई दशक पुराना है, जो अब नए जीवों का घर बन चुका है।

इसके अलावा, वैज्ञानिकों के कैमरे में एक बेहद डरावनी और दुर्लभ जेलीफिश भी कैद हुई, जिसे 'जायंट फैंटम जेलीफिश' यानी विशाल भूतिया जेलीफिश कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश में से एक है। यह जेलीफिश 10 मीटर से भी ज्यादा लंबी हो सकती है। इसके लंबे और डरावने हाथ पानी में किसी भूत की तरह तैरते दिखते हैं। इतिहास में इंसान ने इस जीव को 120 बार से भी कम देखा है, इसलिए इसे कैमरे में कैद करना वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ी कामयाबी है।

28 नई प्रजातियों का खजाना

इस अद्भुत कोरल रीफ के आसपास का जीवन इतना समृद्ध इसलिए भी है क्योंकि यह इलाका अर्जेंटीना के सबसे प्रमुख मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों के ठीक नीचे स्थित है। ऊपर की लहरों में तैरते जीवों के मरने के बाद उनके अवशेष बर्फ की तरह धीरे-धीरे नीचे गिरते रहते हैं, जिसे वैज्ञानिक 'मरीन स्नो' कहते हैं। इसी मरीन स्नो को खाकर ये कोरल और बाकी जीव अपना पेट भरते हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मिशन के दौरान वैज्ञानिकों ने कई अलग-अलग कोरल बेड से कुछ ऐसे जीवों के सैंपल इकट्ठे किए हैं, जिन्हें आज से पहले इंसानों ने कभी नहीं देखा था। वैज्ञानिकों को पूरा शक है कि इनमें से कम से कम 28 प्रजातियां विज्ञान के लिए बिल्कुल नई हैं। इन सभी जीवों पर अभी लैब में बारीकी से अध्ययन चल रहा है।

दक्षिण अटलांटिक महासागर के इस पाताल ने साबित कर दिया है कि हम चाहे आसमान या अंतरिक्ष के जितने भी चक्कर काट लें, लेकिन खुद हमारी धरती के समंदर के नीचे अभी न जाने कितने रहस्य दफन हैं, जिनका सामने आना बाकी है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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