छपरा के मिर्जापुर गांव में किसानों की नई राह, फूलों की खेती ने बदली आर्थिक तकदीर जीवनशैली एक महीने पहले 89
बिहार के छपरा जिले के मिर्जापुर गांव के किसान पारंपरिक खेती से हटकर अब फूलों की व्यवसायिक खेती कर रहे हैं। इस बदलाव ने उनकी आय में कई गुना इजाफा किया है और वे सब्जियों के मुकाबले अधिक लाभ कमा रहे हैं।

खेती की पारंपरिक लीक से हटकर नई शुरुआत

बिहार के सारण जिले में कृषि के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां के किसान अब पुरानी परंपराओं और फसलों को पीछे छोड़कर नकदी फसलों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। मढ़ौरा प्रखंड का मिर्जापुर गांव आज इस बदलाव की एक चमकती हुई मिसाल बनकर सामने आया है। इस गांव के किसान अब केवल साग-सब्जियों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि बड़े स्तर पर फूलों की खेती कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं। इस अनोखी पहल का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा है और उनकी कमाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

साल भर महकते हैं खेत

वर्तमान में मिर्जापुर गांव में लगभग 8 से 10 बीघा भूमि पर पूरे वर्ष फूलों की खेती की जा रही है। इस खेती का प्रबंधन और उत्पादन इतना व्यवस्थित है कि पटना, हाजीपुर, वैशाली और छपरा जैसे बड़े शहरों के व्यापारी खुद खेतों तक पहुँच रहे हैं। फूलों की इस बंपर उपज ने न केवल गांव की तस्वीर बदली है, बल्कि किसानों के जीवन स्तर को भी बेहतर किया है। कई किसान परिवारों ने अपनी फूलों से हुई कमाई के जरिए न सिर्फ अपने लिए पक्के मकानों का निर्माण किया है, बल्कि अपने बच्चों की बेहतर उच्च शिक्षा और उनके विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों का खर्च भी पूरी सहजता से उठाया है।

माली समाज का पुश्तैनी हुनर

मिर्जापुर क्षेत्र में माली समाज के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। इन लोगों का फूलों से जुड़ाव कोई नया नहीं है, बल्कि कई पीढ़ियों से वे इस कला में निपुण रहे हैं। स्थानीय किसान संतोष भगत, जो पिछले 15 वर्षों से फूलों की खेती कर रहे हैं, बताते हैं कि पारंपरिक हरी सब्जियों की तुलना में फूलों की खेती कहीं अधिक लाभप्रद है। इसमें बचत भी ज्यादा है और बाजार में मांग भी निरंतर बनी रहती है।

गेंदा और गुलाब की खेती का गणित

इस गांव में मुख्य रूप से गेंदा फूल की खेती पर जोर दिया जाता है। किसान हर मौसम के अनुसार गेंदे की विभिन्न किस्मों का चयन करते हैं, जिससे खेतों में साल के 12 महीने फूल उपलब्ध रहते हैं। गेंदे के अलावा, कुछ किसान सीमित मात्रा में चेरी गुलाब की भी पैदावार कर रहे हैं। लागत और मुनाफे के आंकड़ों पर गौर करें तो, 1 कट्ठा खेत में गेंदे की फसल लगाने का खर्च लगभग 2 हजार रुपये बैठता है। इसके बदले किसान 5 से 7 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई आसानी से कर लेते हैं। सीजन के अंतिम दौर में भी, 5 कट्ठा खेत से रोजाना लगभग 200 से 500 गेंदे की लड़ियां तैयार हो जाती हैं। बाजार में एक लड़ी की कीमत 15 से 20 रुपये तक होती है, जो किसानों के लिए एक बड़ी राहत है।

आधुनिक तकनीक और जैविक खेती पर जोर

किसान अब केवल पारंपरिक तौर-तरीकों तक सीमित नहीं हैं। वे आधुनिक तकनीक को भी अपना रहे हैं। उन्नत किस्म के बीज या तो ऑनलाइन ऑर्डर किए जाते हैं या फिर सीधे कोलकाता से मंगवाए जाते हैं। किसानों का मानना है कि रासायनिक खादों के उपयोग की जगह जैविक खेती करने से न केवल फूलों की पैदावार बढ़ रही है, बल्कि फूलों की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। कृषि विशेषज्ञों द्वारा भी किसानों को यही सलाह दी जा रही है कि वे मांझी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लें। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने से न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि मुनाफे को और अधिक बढ़ाया जा सकेगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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