दिवाली पर धूम मचा रही सागर की मशहूर नोभा बर्फी, स्वाद ऐसा कि दीवाने हो जाते हैं ग्राहक जीवनशैली एक घंटा पहले 7
सागर में दिवाली के मौके पर नोभा बर्फी की भारी मांग देखी जा रही है। मात्र 300 रुपये प्रति किलो मिलने वाली यह खास मिठाई एक हफ्ते तक खराब नहीं होती है।

त्योहारों के मौसम में नोभा बर्फी की जबरदस्त डिमांड

भारत में दीपावली का त्योहार खुशियों और मिठाइयों का प्रतीक माना जाता है। रोशनी के इस पर्व पर घरों में दीपों की चमक के साथ-साथ तरह-तरह के पकवानों की महक भी फैल जाती है। सागर में मिठाई की कई दुकानें मौजूद हैं, जहां हजार से लेकर 3,000 रुपये प्रति किलो तक की महंगी मिठाइयां मिलती हैं। हालांकि, इन सबके बीच एक ऐसी मिठाई है जिसने अपने अनोखे स्वाद और किफ़ायती दाम के कारण लोगों को अपना दीवाना बना रखा है। इसे नोभा बर्फी के नाम से जाना जाता है।

मकरोनिया बजरिया में मिलती है खास मिठाई

सागर के मकरोनिया बजरिया चौराहे के पास स्थित यह मिठाई अपनी अलग पहचान रखती है। यहां के कारीगर शशिकांत सक्सेना इसे तैयार करते हैं। उनकी दुकान पर दिवाली के शुभ अवसर पर ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है। लोग इस मिठाई को खरीदने के लिए घंटों इंतजार करने को भी तैयार रहते हैं क्योंकि इसका स्वाद काफी लाजवाब होता है। जो भी इसे एक बार चख लेता है, वह इसे बार-बार खाने की इच्छा जाहिर करता है।

किफ़ायती दाम और टिकाऊपन है खासियत

नोभा बर्फी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जेब पर भारी नहीं पड़ती है। इसकी कीमत मात्र 300 रुपये प्रति किलो है। इसके साथ ही, यह मिठाई जल्दी खराब नहीं होती। इसे बनाने की विधि कुछ ऐसी है कि यह आसानी से एक हफ्ते तक ताजी बनी रहती है। यही कारण है कि त्योहार के दिनों में लोग इसे बड़े पैमाने पर खरीदते हैं।

20 साल पुरानी परंपरा और मेहनत

दुकानदार शशिकांत सक्सेना बताते हैं कि उनकी यह दुकान करीब 20 साल पुरानी है। वे होली, रक्षाबंधन और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के मौके पर विशेष रूप से इस मिठाई को तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि इसे बनाने में दूध पाउडर, शक्कर, खाद्य रंग और विशेष मेहनत का उपयोग किया जाता है। वे रोजाना लगभग 40 किलो सामग्री का इस्तेमाल करके ग्राहकों के लिए यह खास नोभा बर्फी तैयार कर रहे हैं, ताकि त्योहार की मिठास और अधिक बढ़ सके।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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