रांची के बिरसा जैविक उद्यान में पहली बार हुआ कमाल, आर्टिफिशियल इंक्यूबेशन से नाग के 5 बच्चों ने लिया जन्म झारखंड एक दिन पहले 10
झारखंड की राजधानी रांची स्थित भगवान बिरसा जैविक उद्यान ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक नई उपलब्धि हासिल की है, जहाँ पहली बार वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग करके नाग के अंडों से सफल हैचिंग की गई है।

रांची के बिरसा जू में वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी

झारखंड की राजधानी रांची स्थित भगवान बिरसा जैविक उद्यान से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बेहद सुखद और उत्साहजनक खबर सामने आई है। जू के लंबे इतिहास में यह पहला मौका है जब वैज्ञानिक तकनीकों का पूर्ण उपयोग करते हुए स्पेक्टेकल्ड कोबरा यानी नाग सांप के अंडों को कृत्रिम ऊष्मायन यानी आर्टिफिशियल इंक्यूबेशन प्रक्रिया से गुजारा गया है। इस वैज्ञानिक प्रयोग के परिणाम स्वरूप नाग के 5 स्वस्थ बच्चों का जन्म हुआ है। यह उपलब्धि न केवल जू प्रबंधन के लिए गर्व का विषय है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम मानी जा रही है।

कृत्रिम ऊष्मायन की विस्तृत प्रक्रिया

जू प्रबंधन द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, नाग सांप के इन अंडों को सफलतापूर्वक अंडों से बाहर निकालने के लिए लगभग 70 दिनों तक नियंत्रित वातावरण में रखा गया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तापमान और आर्द्रता का विशेष वैज्ञानिक ध्यान रखा गया। ज्ञात हो कि स्पेक्टेकल्ड कोबरा, जिसका वैज्ञानिक नाम Naja naja है, की सामान्य इंक्यूबेशन अवधि 48 से 69 दिनों के बीच होती है, ऐसे में 70 दिनों की यह वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक चक्र के अनुरूप रही। इस सफलता ने जू में कार्यरत विशेषज्ञों के हौसले को नई उड़ान दी है।

हर्पेटोलॉजिस्ट के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ प्रयोग

बिरसा जैविक उद्यान के इतिहास में पहली बार हुई इस उपलब्धि को जू के जीव वैज्ञानिक और हर्पेटोलॉजिस्ट विवेकानंद कुमार की देखरेख में अंजाम दिया गया है। उनके मार्गदर्शन में पूरी टीम ने वैज्ञानिक मानकों का कड़ाई से पालन किया। यह शोध और प्रजनन प्रक्रिया सरीसृपों के वैज्ञानिक संरक्षण और उनकी आबादी को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रही है।

सैंड बोआ के 8 शिशुओं का भी हुआ जन्म

केवल नाग के बच्चे ही नहीं, बल्कि इसी दौरान जू में सैंड बोआ प्रजाति के भी 8 स्वस्थ शिशुओं का जन्म हुआ है। जू की आधिकारिक प्रजाति सूची में रेड सैंड बोआ को Eryx johnii और कॉमन सैंड बोआ को Eryx conicus के रूप में दर्ज किया गया है। जानकारी के लिए बता दें कि सैंड बोआ एक गैर विषैला सांप है, जिसका प्राकृतिक वातावरण में विशेष महत्व है। इस दोहरी सफलता ने बिरसा जू को वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक प्रमुख केंद्र बना दिया है।

नवजात सांपों की विशेष निगरानी

जू प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन सभी नवजात सांपों को फिलहाल कड़ी निगरानी और विशेष देखभाल में रखा गया है। पशु चिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश साहू और विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम इन नन्हे जीवों के स्वास्थ्य, उनके विकास की गति और उनके व्यवहार की निरंतर वैज्ञानिक जांच कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन की शुरुआती अवस्था में सांपों को एक सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण उपलब्ध कराना उनके भविष्य के लिए बेहद अनिवार्य है।

संरक्षण प्रजनन और भविष्य की राह

करीब 104 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला भगवान बिरसा जैविक उद्यान लगातार वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता और शोध को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहा है। झारखंड वन विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जू का मुख्य उद्देश्य केवल वन्यजीवों को प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि उनके संरक्षण प्रजनन में भी योगदान देना है। कृत्रिम ऊष्मायन की इस सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य में सरीसृप प्रबंधन, शोध और वैज्ञानिक संरक्षण कार्यक्रमों को और अधिक मजबूती प्रदान की जा सकती है। यह उपलब्धि राज्य में वन्यजीव विज्ञान के प्रति बढ़ते रुझान और जू प्रबंधन की आधुनिक सोच को दर्शाती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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