राष्ट्रीय राजनीति
3 घंटे पहले
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ब्रिक्स समिट में भारत का कूटनीतिक दबदबा
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट के पहले दिन पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिकी हुई हैं। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिनमें पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे उत्पन्न ऊर्जा संकट सबसे प्रमुख हैं। विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस मंच पर चीन, रूस, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली देशों के नेताओं का एक साथ जुटना एक बड़ी घटना है। इस आयोजन के दौरान भारत की भूमिका एक ऐसे देश की रही है जिसने न केवल सदस्य देशों को एक मंच पर लाया, बल्कि जटिल मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां G-7 और NATO जैसे बड़े संगठन भी अक्सर आम राय बनाने में विफल हो रहे हैं, वहां ब्रिक्स देशों का एक साझा बयान जारी करना संगठन की मजबूती और भारत की नेतृत्व क्षमता को रेखांकित करता है।
संयुक्त बयान पर आम सहमति और भारत की भूमिका
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि संयुक्त बयान यानी जॉइंट स्टेटमेंट का जारी होना है। विभिन्न सदस्य देशों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर बढ़ते मतभेदों को देखते हुए यह कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। सूत्रों के मुताबिक, सदस्य देशों के बीच लंबी और कठिन बातचीत का दौर चला, जिसके बाद यह सहमति बन पाई। भारत ने इस पूरी प्रक्रिया में ‘कंसेंसस-बिल्डिंग डिप्लोमेसी’ का बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। हालांकि ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह में हितों की विविधता काफी बढ़ गई है, फिर भी साझा हितों पर एकजुटता दिखाना संगठन के भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत है। भारत ने यह सुनिश्चित किया कि आपसी मतभेदों के बावजूद समूह की एकता बनी रहे और सभी सदस्य देश एक समान एजेंडे पर काम करने के लिए राजी हों। यह उपलब्धि यह दर्शाती है कि वैश्विक मंच पर भारत अब एक ऐसे सुलहकर्ता के रूप में उभरा है जो अलग-अलग मत रखने वाले देशों को एक साथ ला सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय वार्ता
शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। यह बैठक भारत-चीन संबंधों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की और संवाद की प्रक्रिया को निरंतर बनाए रखने पर प्रतिबद्धता जताई। इस वार्ता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सीमा पर शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने पर जोर देना रहा है। दोनों नेताओं ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि भारत और चीन के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति के लिए अनिवार्य शर्त है। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब दोनों देश आपसी तनाव को कम करने और उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस संवाद से सीमा विवाद से जुड़े तनाव में कमी आने और संबंधों में स्थिरता आने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।
क्षेत्रीय शांति के लिए दिल्ली से मिला संदेश
दिल्ली में आयोजित इस वैश्विक मंच का उपयोग शांति और स्थिरता का संदेश देने के लिए भी किया गया। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच हुई मुलाकात ने पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर वैश्विक ध्यान केंद्रित किया है। दोनों नेताओं ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने और आपसी विश्वास बहाली के लिए संवाद बढ़ाने पर सहमति जताई। दिल्ली की धरती पर हुई यह मुलाकात कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के बेहतर अवसरों पर चर्चा की गई। यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि ब्रिक्स सम्मेलन केवल व्यापार या आर्थिक सहयोग का मंच नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों के लिए भी एक बड़ा केंद्र बन गया है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘भारत इन्नोवेट्स’ प्रदर्शनी का भी दौरा किया, जो भारत की युवा शक्ति और उनके नवाचार के प्रति समर्पण को दर्शाता है। यह पूरा आयोजन भारत की बदलती छवि और वैश्विक व्यवस्था में उसकी बढ़ती अहमियत को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर रहा है।
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