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3 घंटे पहले
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इतिहास के पन्नों में बांके बिहारी मंदिर
सीकर जिले के खंडेला स्थित ब्रह्मपुरी में विराजमान बांके बिहारी मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है। यह धार्मिक स्थल करीब 600 साल पुराने गौरवशाली इतिहास और कृष्ण भक्ति की परंपरा को दर्शाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर की स्थापना के पीछे भक्त शिरोमणि करमैती बाई की अटूट श्रद्धा और तपस्या की एक प्रेरणादायक कहानी है।
करमैती बाई और कृष्ण का मिलन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार करमैती बाई बचपन से ही भगवान कृष्ण की परम भक्त थीं। विवाह के पश्चात वे वृंदावन चली गई थीं, जहाँ उन्होंने प्रभु को पाने के लिए कठोर तपस्या की। कथा के अनुसार, करमैती बाई ने लगातार 18 दिनों तक घोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने एक संत के वेश में उन्हें दर्शन दिए। बाद में उन्होंने यमुना नदी से श्रीकृष्ण की दिव्य प्रतिमा निकाली। इस प्रतिमा को उन्होंने अपने पिता के साथ आए परशुरामजी को सौंप दिया, जिसके बाद इसे खंडेला लाकर पूरे विधि विधान से स्थापित किया गया।
जन्माष्टमी पर विशेष आयोजन
इस ऐतिहासिक मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है। मंदिर में भगवान का अभिषेक 108 विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियों से किया जाता है। यह पवित्र प्रक्रिया लगभग ढाई से तीन घंटे तक निरंतर चलती है। आधी रात को ठीक 12 बजे जब भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य होता है, तब मंदिर में विशेष पूजा और आरती का आयोजन किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
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