झारखंड
6 घंटे पहले
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सोशल मीडिया पर बिना मिट्टी के आधुनिक तरीके से खेती करते हुए दिखाने वाले वीडियो अक्सर खूब देखे जाते हैं। यही हाइड्रोपोनिक तकनीक अब झारखंड में भी तेजी से लोगों के बीच पहचान बना रही है। रांची के मोराबादी मैदान में झारखंड सरकार की ओर से आयोजित तीन दिवसीय कृषि व्यापार मेले में यह खेती लोगों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बनी रही।
मेले में सशंका एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी के स्टॉल पर किसानों और आम लोगों को इस आधुनिक तकनीक की बारीकियां समझाई जा रही थीं। जानकारों का कहना है कि इस तकनीक की मदद से कोई भी व्यक्ति अपने घर की छत, बालकनी या किसी खाली पड़े कमरे में भी सालभर ताजी और पौष्टिक सब्जियां उगा सकता है। बढ़ते शहरीकरण और लगातार घटती खेती योग्य जमीन के बीच यह तरीका खेती के एक कारगर विकल्प के रूप में सामने आ रहा है।
एनएफटी तकनीक से जड़ों तक पहुंचता है पोषण
कंपनी के डिप्टी मैनेजर संजीव कुमार ने बताया कि हाइड्रोपोनिक तकनीक खासतौर पर उन इलाकों के लिए बेहद उपयोगी है, जहां मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी नहीं है या खेती लायक भूमि की कमी है। इस व्यवस्था में मिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि पानी में घुले जरूरी पोषक तत्वों के सहारे पौधों को विकसित किया जाता है। इससे कम जगह में भी अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस तकनीक में एनएफटी यानी न्यूट्रिएंट फिल्म टेक्नोलॉजी का उपयोग होता है। इसके तहत मल्टी-लेयर सिस्टम में पीवीसी पाइपों के भीतर पोषक तत्वों से भरे पानी का लगातार प्रवाह बनाए रखा जाता है। पाइपों के ऊपरी हिस्से में नेट पॉट लगाए जाते हैं और कोकोपीट की मदद से उनमें पौधे स्थापित किए जाते हैं। पौधों की जड़ें हमेशा पोषक तत्वों वाले पानी के संपर्क में रहती हैं, जिससे उनकी बढ़वार एक समान और तेज गति से होती है।
पत्तेदार सब्जियों से लेकर स्ट्रॉबेरी तक की खेती मुमकिन
संजीव कुमार के मुताबिक हाइड्रोपोनिक तकनीक से उगाई गई फसलों में बढ़वार एक जैसी देखने को मिलती है। साथ ही पौधे मिट्टी से फैलने वाले कई कीटों और रोगों से भी बचे रहते हैं। इस तरीके से पालक, धनिया, मेथी, अलग-अलग तरह के साग, टमाटर, मिर्च, खीरा और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। हालांकि जिन पौधों का तना बहुत अधिक कठोर होता है, उन्हें इस प्रणाली में उगाना उपयुक्त नहीं माना जाता।
उन्होंने बताया कि छोटे स्तर पर हाइड्रोपोनिक सिस्टम लगाने की लागत करीब 8 से 10 हजार रुपये से शुरू होती है। जरूरत और उत्पादन क्षमता के हिसाब से इसका आकार बढ़ाया जा सकता है, और आकार बढ़ने के साथ लागत भी बढ़ती जाती है।
बंद कमरे में भी हो सकती है खेती
संजीव कुमार ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति बंद कमरे के भीतर हाइड्रोपोनिक खेती करना चाहता है, तो वहां ब्रॉड स्पेक्ट्रम व्हाइट एलईडी लाइट का इस्तेमाल किया जाता है। यह रोशनी सूरज की धूप का विकल्प बनकर पौधों को जरूरी प्रकाश उपलब्ध कराती है। इससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बेहतर होती है, जड़ें मजबूत बनती हैं और पौधों में हरी-भरी पत्तियां विकसित होती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोपोनिक खेती आने वाले समय में खेती का एक अहम और टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती है। यह तकनीक न सिर्फ किसानों के लिए, बल्कि शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए भी खेती के नए रास्ते खोल रही है।
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