छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी स्कूलों में जारी रहेगा गायत्री मंत्र और प्रार्थना का पाठ छत्तीसगढ़ 2 महीने पहले 72
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान गायत्री मंत्र और हिंदू प्रार्थनाओं के अनिवार्य गायन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इससे किसी के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होता है।

याचिका खारिज होने का मामला

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा को लेकर दायर की गई याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इस याचिका में राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत स्कूलों में गायत्री मंत्र और कुछ अन्य हिंदू प्रार्थनाओं को सुबह की सभा का हिस्सा बनाया गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि राज्य सरकार का यह कदम स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने जैसा है, जिस पर रोक लगनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने तमाम दलीलों पर गौर करने के बाद इस मांग को स्वीकार नहीं किया और सरकारी आदेश को बरकरार रखने का निर्णय लिया।

याचिका में दी गई मुख्य दलीलें

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब 12 जून 2026 को अदालत में याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि सरकार का यह निर्देश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25, 28(1), 29 और 30 का सीधा उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि जब सरकारी स्कूलों में किसी एक धर्म से जुड़ी विशिष्ट प्रार्थनाएं अनिवार्य की जाती हैं, तो इससे अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों में असहजता पैदा हो सकती है और वे मानसिक दबाव का सामना कर सकते हैं। याचिकाकर्ताओं का मानना था कि इससे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर असर पड़ता है।

राज्य सरकार का पक्ष और उद्देश्य

राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए सरकारी वकील ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया। सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि इस निर्देश के पीछे कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है और न ही किसी पर कोई धर्म थोपा जा रहा है। सरकार का तर्क है कि गायत्री मंत्र के पाठ का उद्देश्य केवल सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना, छात्रों की एकाग्रता बढ़ाना और उनमें नैतिक मूल्यों का विकास करना है। इसे NEP 2020 (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) के विजन के अनुरूप बताते हुए सरकार ने कहा कि इसका ध्येय भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत करना है, न कि किसी विशेष धर्म का प्रचार करना।

अनुशासन और छात्रों पर असर

कोर्ट के सामने सरकार ने यह भी सफाई दी कि आदेश में लिखे गए अनिवार्य और सुनिश्चित करें जैसे शब्दों का इस्तेमाल केवल स्कूल परिसर में अनुशासन और एक निश्चित व्यवस्था कायम रखने के लिए किया गया है। सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि अगर कोई छात्र किसी विशेष प्रार्थना में शामिल नहीं होना चाहता है, तो उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की जाएगी और न ही उसे दंडित किया जाएगा। कोर्ट ने माना कि सरकार की मंशा छात्रों के बीच नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना है और जब तक यह किसी सिद्धांत के प्रचार में नहीं बदलता, तब तक यह संविधान के दायरे के भीतर है।

अदालत का अंतिम निष्कर्ष

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं कि इस आदेश से उनके किसी मौलिक अधिकार का वास्तविक उल्लंघन हुआ है। अदालत के अनुसार, केवल किसी निर्देश पर आपत्ति जताना काफी नहीं है, बल्कि उसके कारण किसी व्यक्ति को हुई सीधी हानि को साबित करना आवश्यक होता है, जो यहाँ नहीं हुआ। इस प्रकार, अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए सरकारी स्कूलों में चल रही मौजूदा प्रार्थना पद्धति को जारी रखने की अनुमति दे दी है। इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसे नैतिक मूल्यों की जीत बताया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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