बिजली दरों में बढ़ोतरी पर जम्मू-कश्मीर की सियासत गरमाई, फारूक अब्दुल्ला बोले- कब तक नई दिल्ली के सामने फैलाते रहोगे हाथ? जम्मू-कश्मीर 4 घंटे पहले 7
जम्मू-कश्मीर में आगामी 1 सितंबर से बिजली दरों में होने जा रही 6.83 प्रतिशत की वृद्धि पर विपक्षी दलों के कड़े रुख के बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने राज्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मुद्दा उठाया है।

जम्मू-कश्मीर की सियासत में इस समय बिजली के बिलों ने एक नया और गरमा-गरम विवाद खड़ा कर दिया है। केंद्र शासित प्रदेश में बिजली दरों में की जाने वाली आगामी बढ़ोतरी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। दरअसल, आगामी 1 सितंबर से जम्मू-कश्मीर में बिजली की दरों में 6.83 प्रतिशत की बढ़ोतरी लागू होने जा रही है। इस प्रशासनिक फैसले ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नई सरकार के सामने शुरुआत में ही एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।

विपक्षी दलों का चौतरफा हमला और प्रदर्शन की तैयारी

इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर का समूचा विपक्ष उमर अब्दुल्ला सरकार के खिलाफ एकजुट हो गया है। विभिन्न राजनीतिक दल इस बढ़ोतरी को जनविरोधी बताते हुए लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं। इस क्रम में, भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले के खिलाफ अपनी रणनीति साझा करते हुए आगामी 2 सितंबर को सिविल सचिवालय का घेराव करने का ऐलान किया है। इसके अलावा, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और अपनी पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतें भी इस मूल्य वृद्धि के खिलाफ पहले ही विरोध प्रदर्शन कर चुकी हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में बड़े-बड़े वादे करने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार अब आम जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ डाल रही है।

फारूक अब्दुल्ला का तीखा सवाल: 'कब तक गुलाम बने रहेंगे?'

जब इस संवेदनशील मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला से पूछा गया कि क्या जम्मू-कश्मीर सरकार जनता को राहत देने के लिए इस बढ़ी हुई बिजली दरों की समीक्षा करेगी, तो उन्होंने इस पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी। फारूक अब्दुल्ला ने सीधे तौर पर केंद्र पर जम्मू-कश्मीर की आर्थिक निर्भरता को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि आखिर जम्मू-कश्मीर कब तक वित्तीय सहायता के लिए नई दिल्ली के सामने हाथ फैलाता रहेगा?

उन्होंने तर्क दिया कि यदि इस क्षेत्र को अधिक राजनीतिक स्वायत्तता और अधिकार चाहिए, तो उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा, "मुझे यह बताइए कि आप लोग कब तक गुलाम बने रहेंगे? कभी न कभी तो आपको अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा। आप आखिर कब खड़े होंगे?"

उन्होंने बिजली की इस मूल्य वृद्धि के मुद्दे को अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग से जोड़ते हुए कहा कि एक तरफ आप विशेष दर्जे की मांग करते हैं, और दूसरी तरफ आर्थिक मदद के लिए दिल्ली के आगे हाथ फैलाते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये दोनों बातें एक साथ कभी नहीं चल सकतीं।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बचाव और पूर्व सरकारों पर निशाना

दूसरी ओर, विपक्ष के इन हमलों का जवाब देने के लिए खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सामने आए हैं। एक जनसभा को संबोधित करते हुए उमर अब्दुल्ला ने अपनी सरकार के फैसले का मजबूती से बचाव किया। उन्होंने विपक्षी दलों को उनके अपने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि जब ये दल सत्ता में थे, तब उन्होंने बिजली की दरों में 13.5 प्रतिशत से लेकर 14 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी की थी।

मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उनकी सरकार ने दरों में बहुत मामूली बदलाव किया है ताकि उपभोक्ताओं पर ज्यादा बोझ न पड़े। जनता को भरोसा देते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की कि उनकी सरकार आने वाले अगले 3 वर्षों तक बिजली की दरों में कोई और बढ़ोतरी नहीं करेगी।

चुनावी वादे और आंतरिक चुनौतियां

बिजली दरों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर हो रही है जब नेशनल कॉन्फ्रेंस पहले से ही अनुच्छेद 370 और राज्य के दर्जे की बहाली जैसे मुद्दों पर विपक्ष के तीखे हमलों का सामना कर रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि विधानसभा चुनाव के दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जनता से हर महीने 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का चुनावी वादा किया था। ऐसे में, सरकार के इस शुरुआती दौर में ही बिजली दरों में बढ़ोतरी के फैसले ने विपक्ष को सरकार को घेरने का एक बड़ा मौका दे दिया है।

इसके साथ ही, पार्टी के भीतर भी सब कुछ सामान्य नहीं दिख रहा है। पिछले दिनों फारूक अब्दुल्ला ने अपनी ही पार्टी के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी को लेकर एक बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। उन्होंने आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी से कहा था कि अगर उन्हें ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव में उनकी जीत उनके व्यक्तिगत समर्थन के कारण हुई थी, तो उन्हें तुरंत लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए और जनता के बीच जाकर नए सिरे से जनादेश प्राप्त करना चाहिए।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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