52 साल पुरानी साजिश और चीनी परियोजना का विरोध... PoK में फिर क्यों धधक उठी बगावत? जानिए पूरी कहानी पाकिस्तान एक महीने पहले 19
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के रावलाकोट, मुजफ्फराबाद और गिलगित-बाल्टिस्तान में एक बार फिर प्रदर्शन और झड़पें भड़क उठी हैं, जिसमें पुलिस कार्रवाई के दौरान 12 लोगों की मौत हो गई। महंगाई, बिजली बिल और आरक्षित सीटों को लेकर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। रावलाकोट, मुजफ्फराबाद और गिलगित-बाल्टिस्तान के कई हिस्सों में प्रदर्शन, टकराव और सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने पूरे इलाके को अशांति की चपेट में ले लिया है। इंटरनेट सेवाओं पर रोक, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और थमने का नाम न ले रहे विरोध प्रदर्शनों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर पाकिस्तानी नियंत्रण वाले इस इलाके की जनता इतनी आक्रोशित क्यों है। ताजा प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई में 12 लोगों की जान चली गई।

पहले समझिए PoK का भूगोल

इस विरोध की पूरी पृष्ठभूमि समझना जरूरी है, क्योंकि इस इलाके के बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी है। जिसे हम PoK यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर कहते हैं, पाकिस्तान ने उसे भी दो हिस्सों में बांट रखा है। जिसे वे लोग आज़ाद जम्मू कश्मीर कहते हैं, वह PoK का छोटा हिस्सा है और भारत के मौजूदा जम्मू-कश्मीर से सटा हुआ है।

वहीं नक्शे में ऊपर की ओर, भारत के लद्दाख से लगने वाले PoK के इलाके को पाकिस्तान ने पहले से ही गिलगित-बाल्टिस्तान के नाम से अलग कर रखा है। इस तरह आज़ाद जम्मू कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान, दोनों को मिलाकर ही पूरा PoK बनता है।

लंबे समय से सुलग रहा असंतोष

पूरे PoK में महंगाई, बेरोजगारी, बिजली के भारी-भरकम बिल और आटे-रोटी का संकट लंबे अरसे से बना हुआ है। पिछले साल यानी 2025 के सितंबर-अक्टूबर में यहां बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए थे। कुछ समय पहले स्थानीय लोगों ने जम्मू कश्मीर जॉयंट अवामी ऐक्शन कमिटी (JAAC) नाम का एक संगठन बनाया था, जिसने 38 मांगों के साथ शटर डाउन और चक्का जाम का आह्वान किया था।

लोगों का गुस्सा महंगाई, बिजली के बिल, सरकारी एलिट वर्ग को मिले विशेष अधिकारों और चुनावों में बाहरी लोगों के लिए आरक्षित सीटों को लेकर था। ये प्रदर्शन हिंसक हो उठे और पुलिस फायरिंग में 10-12 लोग मारे गए, जबकि सैकड़ों घायल हुए। उस दौरान भी इंटरनेट बंद कर दिया गया था।

समझौते के बाद भी नहीं थमा गुस्सा

आखिरकार 4 अक्टूबर 2025 को सरकार और JAAC के बीच समझौता हुआ और ज्यादातर मांगें मान ली गईं। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि किए गए वादे जमीन पर पूरे नहीं हुए, इसलिए समझौते के बावजूद नाराजगी कम नहीं हुई।

अब JAAC ने एक बार फिर आवाज बुलंद की है, क्योंकि वादे अधूरे हैं, बिजली कटौती जारी है और महंगाई और बढ़ गई है। इसके अलावा आज़ाद कश्मीर के चुनावों में 12 सीटें पाकिस्तान में रह रहे कश्मीरी शरणार्थियों के नाम पर आरक्षित कर दी गई हैं।

आरक्षित सीटों पर भड़की नाराजगी

स्थानीय लोग मानते हैं कि बाहर रहने वाले इन कश्मीरियों के नाम पर सीटें आरक्षित रखने से असली स्थानीय कश्मीरियों की आवाज छीनी जा रही है। उनका साफ कहना है कि यह व्यवस्था उनके अधिकारों पर सीधा हमला है।

इस बीच पाकिस्तान सरकार ने JAAC को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंधित कर दिया है, यानी एक तरह से उसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया है। इसी कार्रवाई ने स्थानीय जनता के आक्रोश को और भड़का दिया है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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