बिहार
7 घंटे पहले
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विचारों
पार्टी के भीतर बगावती सुर
बिहार में विधान परिषद चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के भीतर आंतरिक कलह खुलकर सामने आ गई है। पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सीधे तौर पर अपने भाई और पार्टी के फैसले लेने वाले शीर्ष नेतृत्व तेजस्वी यादव के निर्णयों पर सवाल उठा दिए हैं। रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया के माध्यम से पार्टी द्वारा टिकट वितरण की प्रक्रिया को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है और नए या अवसरवादी चेहरों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।
उम्मीदवारों की घोषणा और विवाद
राजद ने 11 सितंबर को बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव के मद्देनजर अपने छह उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया था। इनमें पटना शिक्षक सीट से डॉ. संजीव कुमार सिंह, पटना स्नातक सीट से दिलीप कुमार, कोसी स्नातक सीट से नितेश कुमार, दरभंगा स्नातक सीट से अनिल कुमार झा, सारण शिक्षक सीट से प्रोफेसर जयराम यादव और तिरहुत स्नातक सीट से डॉ. रश्मि विनायक गौतम को प्रत्याशी बनाया गया है। अभी भी दो सीटों पर पार्टी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन इन छह नामों के ऐलान के साथ ही रोहिणी आचार्य की नाराजगी सार्वजनिक हो गई।
लालूवादियों के साथ वादाखिलाफी का आरोप
रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा कि पार्टी द्वारा अवसरवादी चेहरों को प्राथमिकता देना उन तमाम समर्पित नेताओं और पार्टी समर्थकों का अपमान है जिन्होंने वर्षों तक राजद के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने इसे सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव की विचारधारा के प्रति निष्ठावान रहने वाले कार्यकर्ताओं के साथ वादाखिलाफी करार दिया है। रोहिणी का मानना है कि इस तरह के फैसलों से संगठन की जड़ें कमजोर होती हैं और पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक रही है। उनके इस पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है कि क्या लालू परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
पारिवारिक और सांगठनिक मतभेद का इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब रोहिणी आचार्य ने पार्टी के निर्णयों को लेकर सार्वजनिक रूप से असहज करने वाली टिप्पणी की हो। सिंगापुर में अपने पिता लालू यादव को किडनी डोनेट करने के बाद रोहिणी आचार्य राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आई थीं, लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने पार्टी की कार्यप्रणाली से थोड़ी दूरी बना ली है। हालांकि, डिजिटल माध्यमों के जरिए वे लगातार अपनी राय रखती रही हैं। इससे पहले जून महीने में भी विधान परिषद चुनाव के संदर्भ में उन्होंने एक विशिष्ट उम्मीदवार को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया था। लोकसभा चुनावों के बाद से ही उनकी यह नाराजगी रह-रहकर सामने आती रही है, जो अब पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।
बची हुई सीटों पर अब सबकी नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रोहिणी आचार्य का यह हमला सिर्फ टिकट बंटवारे तक सीमित नहीं है। यह राजद के भीतर चल रहे उन गहरे मतभेदों को दर्शाता है जो पुराने वफादार नेताओं और नए नेतृत्व के बीच वैचारिक रूप से उत्पन्न हुए हैं। अभी भी आठ में से दो सीटों पर पार्टी को अपने उम्मीदवारों के नाम तय करने हैं। रोहिणी के इस कड़े रुख के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी नेतृत्व अपने फैसलों पर दोबारा विचार करता है या फिर बगावत की यह चिंगारी और अधिक भड़कती है। पार्टी के पुराने कार्यकर्ता अब यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि आने वाले दिनों में नेतृत्व कोई ऐसा कदम उठाएगा जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे और पार्टी में अनुशासन कायम रह सके। फिलहाल रोहिणी आचार्य की इस टिप्पणी ने राजद के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।
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