पटना के नरेश अग्रवाल के घर से बरसों से नहीं निकला गीला कचरा, नगर निगम भी रह गया हैरान; बिना खर्च यूं तैयार होती है पौधों की टॉनिक बिहार एक घंटा पहले 2
पटना के नाला रोड में रहने वाले नरेश अग्रवाल रसोई के गीले कचरे को छत पर प्रोसेस कर पौधों के लिए मुफ्त प्राकृतिक टॉनिक बनाते हैं। बिना किसी खर्च वाला यह मॉडल देखने नगर निगम की टीम तक उनके घर पहुंच चुकी है।

सोचिए, अगर आपके घर से रोज निकलने वाला गीला कचरा फेंकने के बजाय पौधों के लिए मुफ्त टॉनिक में बदल जाए तो कैसा रहे? सुनने में भले ही यह बात कुछ अजीब लगे, लेकिन राजधानी पटना के नाला रोड में रहने वाले नरेश अग्रवाल ने इसे सच कर दिखाया है। उनके घर से वर्षों से गीला कचरा बाहर नहीं निकलता। रसोई से निकलने वाले फल और सब्जियों के छिलकों समेत दूसरे जैविक कचरे को वे एक खास विधि से प्रोसेस कर पौधों के लिए पोषक टॉनिक तैयार कर लेते हैं। खास बात यह है कि इसे बनाने में एक रुपये का भी अतिरिक्त खर्च नहीं आता।

नरेश के इस अनोखे प्रयोग को नजदीक से देखने और समझने के लिए नगर निगम के कर्मचारी तक उनके घर पहुंच चुके हैं। पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन का यह मॉडल अब आसपास के कई लोगों के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है।

बरसों से इस घर से बाहर नहीं जाता गीला कचरा

नरेश अग्रवाल बताते हैं कि नगर निगम में सिटी एम्बेसडर के रूप में काम करते हुए उन्होंने थ्री-आर यानी रिड्यूस, रीयूज और रिसाइकल का सिद्धांत सीखा था। इसी सोच को उन्होंने अपने घर की रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। घर में निकलने वाले सब्जी-फल के छिलकों और दूसरे गीले कचरे को वे फेंकने के बजाय उसका इस्तेमाल करते हैं। पिछले कई वर्षों से उनके घर का गीला कचरा बाहर नहीं जाता, बल्कि पौधों के पोषण में काम आता है।

यही वजह है कि कचरा उठाने आने वाले नगर निगम के कर्मचारी भी अक्सर हैरान रह जाते हैं। उनका कहना है कि इस घर से कभी गीला कचरा निकलते देखा ही नहीं गया। इस अनोखी व्यवस्था को समझने के लिए कई बार निगमकर्मी खुद उनके घर तक पहुंच चुके हैं।

कचरे से ऐसे तैयार होती है पौधों की टॉनिक

नरेश अग्रवाल बताते हैं कि घर से निकलने वाले गीले कचरे को वे सीधे फेंकते नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने छत पर एक विशेष कंटेनर रखा हुआ है, जिसमें रोजाना थोड़ा-थोड़ा कचरा डाला जाता है। हर बार कचरा डालने के बाद उसके ऊपर मिट्टी की एक परत बिछा दी जाती है। इसी तरह कचरे और मिट्टी की कई परतें बनती चली जाती हैं।

उन्होंने बताया कि कंटेनर के निचले हिस्से में एक छोटा नल लगा है, जहां समय के साथ कचरे से निकलने वाला तरल पदार्थ जमा होता रहता है। धूप और प्राकृतिक प्रक्रिया के चलते यह तरल धीरे-धीरे तैयार होता है। जब इसकी मात्रा करीब एक लीटर हो जाती है, तो उसमें दस लीटर सामान्य पानी मिलाकर पौधों पर छिड़काव किया जाता है। यह मिश्रण पौधों के लिए प्राकृतिक टॉनिक का काम करता है और उनकी बढ़वार में मदद करता है।

इसके साथ ही कंटेनर में जमा जैविक कचरा भी धीरे-धीरे सड़कर कम होता जाता है। इस तरह गीले कचरे के निस्तारण और पौधों के लिए पोषक तत्व तैयार करने की यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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