गंडक नदी में फिर लौटे घड़ियाल, नमामि गंगे का संदेश- नदी बचेगी तभी बचेगा जीवन बिहार 5 घंटे पहले 8
गंडक नदी के बागाहा क्षेत्र में इस प्रजनन सीज़न के पहले 31 घड़ियाल शावकों ने जन्म लिया और उन्हें नदी में छोड़ा गया है। नमामि गंगे ने वीडियो साझा करते हुए कहा कि नदी सुरक्षित रहेगी तभी जीवन बचेगा।

नदियों के महत्व और उनकी सेहत में आ रहे सुधार को दर्शाता एक मनभावन वीडियो इन दिनों चर्चा में है। इस वीडियो के ज़रिए नदियों को बचाने का गहरा संदेश दिया गया है। यह दृश्य गंडक नदी के बागाहा क्षेत्र का है, जिसमें घड़ियाल के नन्हे शावक नज़र आ रहे हैं। नमामि गंगे ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए घड़ियाल और उसके शावकों का यह वीडियो साझा किया है।

बागाहा में जन्मे 31 घड़ियाल शावक

नमामि गंगे ने वीडियो साझा करते हुए लिखा है कि बागाहा क्षेत्र में इस प्रजनन सीज़न के पहले 31 घड़ियाल शावकों का जन्म हुआ है और उन्हें नदी में छोड़ दिया गया है। घड़ियाल को एक संकेतक प्रजाति माना जाता है, यानी ये वहीं जीवित रह पाते हैं जहां नदी का पानी साफ-सुथरा और पर्याप्त गहरा हो। इनकी मौजूदगी ही इस बात का प्रमाण है कि उस नदी का जल स्वच्छ और बेहतर स्थिति में है।

कभी गंडक से लगभग गायब हो चुकी थी प्रजाति

पोस्ट में आगे बताया गया है कि IUCN की क्रिटिकली इंडेंजर्ड सूची में दर्ज यह प्रजाति कभी गंडक नदी से लगभग गायब हो चुकी थी। लेकिन आज यहां इनकी संख्या 1,000 से अधिक पहुंच चुकी है। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है। इसके पीछे नदी संरक्षण, वन्यजीव निगरानी तथा बिहार वन विभाग और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वर्षों के साझा प्रयास हैं।

नमामि गंगे के अनुसार इस सीज़न में अब तक पाँच घड़ियाल घोंसले चिन्हित किए जा चुके हैं और सभी की सक्रिय निगरानी लगातार जारी है। पोस्ट के अंत में लिखा गया है कि जब नदी बचती है, तो उसके साथ यह सब कुछ बच जाता है। इस अंतिम पंक्ति के ज़रिए शायद सभी को यही संदेश दिया जा रहा है कि नदी को बचाने से ही जीवन बचेगा।

इंसानों के लिए खतरनाक नहीं होते घड़ियाल

घड़ियाल लंबे थूथन या चोंच जैसे लंबे मुंह वाले मगरमच्छ की एक प्रजाति होते हैं। ये मुख्य रूप से मछलियां खाते हैं और आम मगरमच्छ की तरह इंसानों के लिए खतरनाक साबित नहीं होते। दरअसल इनका मुंह केवल मछली पकड़ने के लिए ही बना होता है। चोंच की तरह संकरा मुंह होने के कारण ये मनुष्यों के लिए अधिक खतरा नहीं बनते।

प्रदूषण और रेत खनन से घटी थी आबादी

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले तक गंडक नदी से घड़ियाल लगभग लुप्त हो चुके थे, इसी कारण IUCN ने इन्हें गंभीर रूप से लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है। नदी के पानी में प्रदूषण, जगह-जगह बने बांध और रेत खनन के चलते नदी में आए बदलावों के कारण इनकी आबादी में भारी गिरावट आई थी।

अब एक बार फिर नदी में इनकी मौजूदगी यह बताती है कि गंडक के पानी की गुणवत्ता घड़ियालों के अनुकूल हो चुकी है। इससे साफ है कि जब नदियों को स्वच्छ और सुरक्षित रखा जाता है, तो वन्यजीव दोबारा नदियों में लौट आते हैं। साफ पानी मछलियों की आबादी बढ़ने का भी संकेत है, जिससे नदी में मछलियों की संख्या में भी इज़ाफा होता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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