बिहार में छात्र आंदोलन का लंबा इतिहास: 71 साल पहले बीएन कॉलेज से उठी थी चिंगारी और मंच पर फट गया था कुर्ता बिहार 59 मिनट पहले 4
हालिया पेपर लीक विवादों के बीच बिहार के छात्रों का संघर्ष चर्चा में है। आइए जानते हैं आजाद भारत में बिहार के पहले छात्र आंदोलन की अनकही कहानी और महामाया प्रसाद के उस भावुक नेतृत्व के बारे में, जिसने सूबे की राजनीति बदल दी थी।

बिहार में विरोध का गौरवशाली इतिहास

NEET जैसी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में पेपर लीक की घटनाओं को लेकर देशभर में छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। इस आंदोलन की आग में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को भी घेरा गया। बिहार के छात्रों ने जिस तरह सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की है, वह एक मिसाल बन गई है। यह मौका है कि हम आज की Gen Z पीढ़ी के संघर्ष को देखते हुए उन ऐतिहासिक पन्नों को पलटें, जहां से बिहार में छात्र आंदोलनों की नींव रखी गई थी।

आजाद भारत का पहला छात्र आंदोलन

बिहार की छात्र राजनीति का इतिहास काफी पुराना और प्रभावशाली रहा है। अगर हम 71 साल पीछे जाएं, तो आजाद भारत के शुरुआती दौर में ही बिहार ने एक ऐसा छात्र आंदोलन देखा था जिसने पूरे तंत्र को झकझोर कर रख दिया था। इस आंदोलन की शुरुआत राजधानी पटना के बीएन कॉलेज से हुई थी। उस दौर की राजनीति और छात्रों के प्रति नेताओं का नजरिया आज की राजनीति से काफी अलग और भावनाओं से ओतप्रोत था।

महामाया प्रसाद का अनोखा अंदाज

इस ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की चर्चा महामाया प्रसाद के बिना पूरी नहीं हो सकती। वे उस समय छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय नेता थे। उनके नेतृत्व करने का तरीका आज के दौर में कल्पना से परे लगता है। महामाया प्रसाद न केवल छात्रों की मांगों का समर्थन करते थे, बल्कि वे खुद को उनका अभिभावक मानते थे।

जब मंच पर रो पड़े थे नेता

इस आंदोलन से जुड़ी सबसे दिलचस्प कहानी महामाया प्रसाद के भाषण और उनके व्यवहार से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब वे छात्रों को संबोधित करने मंच पर पहुंचे, तो उन्होंने छात्रों को 'मेरे जिगर के टुकड़े' कहकर पुकारा। उनके संबोधन में इतनी गहराई और भावुकता थी कि वे खुद को रोक नहीं पाए। भावनाओं के सैलाब में उन्होंने भरे मंच पर अपना कुर्ता फाड़ लिया और फूट-फूटकर रोने लगे। उनका यह अंदाज छात्रों के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता था। आज भले ही राजनीति के तौर-तरीके बदल गए हों, लेकिन बिहार के छात्र आंदोलनों की यह पहली कहानी आज भी प्रेरणा और संघर्ष की मिसाल बनी हुई है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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