जब पटना में सजती थी ताश की भव्य महफिल, 1934 के टूर्नामेंट में थे कड़े नियम और एक रुपये की एंट्री फीस बिहार एक घंटा पहले 2
साल 1934 में पटना में आयोजित ताश (ब्रिज) टूर्नामेंट में शहर के नामचीन लोग हिस्सा लेते थे, जिसकी एंट्री फीस सिर्फ एक रुपये थी और खेल के लिए बेहद सख्त नियम बनाए गए थे। समय पर न पहुंचने वाली टीम की हार मान ली जाती थी।

आज के दौर में ज्यादातर लोग ताश को महज मनोरंजन या वक्त गुजारने का जरिया मानते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब पटना में इस खेल के भव्य टूर्नामेंट आयोजित हुआ करते थे। सुनने में भले ही यह बात अनोखी लगे, पर 1900 के दशक में शहर के प्रतिष्ठित लोगों के बीच ताश एक बेहद लोकप्रिय खेल था।

इसका सबूत उस दौर के मशहूर उद्योगपति, समाजसेवी और कला संग्राहक दीवान बहादुर राधाकृष्ण जालान के संग्रह में सुरक्षित दस्तावेजों और तस्वीरों से मिलता है। 1934 में हुए एक ताश टूर्नामेंट की तस्वीरें और उससे जुड़े नियमों की लंबी सूची आज भी सहेजकर रखी गई है। इन दुर्लभ धरोहरों को उनके परपोते आदित्य जालान ने अपने प्लानेट पटना म्यूजियम में संभालकर रखा है, जहां आम लोग भी इन्हें देख सकते हैं।

प्रतिष्ठा का प्रतीक था यह खेल

दिलचस्प बात यह है कि इस टूर्नामेंट में मुख्य रूप से पटना सिटी नगर निगम क्षेत्र के निवासी ही भाग लेते थे। भागीदारी से लेकर खेल के संचालन तक हर पहलू के लिए सख्त नियम तय किए गए थे। शहर के नामचीन और प्रभावशाली लोग इन आयोजनों में शामिल होते थे और ताश की बाजियों के साथ देर रात तक महफिलें सजती थीं। उस वक्त यह खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और प्रतिष्ठा का भी प्रतीक माना जाता था।

अंग्रेजों के आने से पहले भी भारत में था ताश

प्लानेट पटना के एमडी मो. अज़फर अहमद ने लोकल 18 को बताया कि भारत में ताश खेलने की परंपरा कोई नई नहीं है। अंग्रेजों के आने से बहुत पहले से यहां तरह-तरह के ताश के खेल खेले जाते थे। उस समय हाथ से बनाए गए गोल आकार के ताश के पत्ते खासे लोकप्रिय थे।

इन पत्तों पर दशावतार, रामायण और दूसरी धार्मिक कथाओं से जुड़े चित्र उकेरे जाते थे। राजघरानों, शाही दरबारों और कारीगर समुदायों में इन पत्तों का खूब इस्तेमाल होता था। इन्हें सिर्फ खेल का साधन नहीं, बल्कि कला का एक खूबसूरत नमूना भी माना जाता था।

अंग्रेजों ने शुरू किया ब्रिज का खेल

बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान ब्रिज नाम का ताश का खेल भारत पहुंचा। रणनीति और सूझबूझ से ताश खेलने की परंपरा यहां पहले से मौजूद थी, इसलिए लोगों ने इस नए खेल को भी जल्दी अपना लिया।

ब्रिज में चार खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। दो-दो खिलाड़ियों की एक टीम बनती है और वे एक आयताकार मेज के चारों ओर आमने-सामने बैठते हैं। जीत के लिए दोनों साथियों को मिलकर रणनीति बनानी पड़ती है। इसी साझेदारी और तालमेल को प्रतीकात्मक रूप से ब्रिज यानी सेतु कहा जाता है।

एलीट तबके में बढ़ी लोकप्रियता

धीरे-धीरे यह खेल अंग्रेज अधिकारियों, बड़े जमींदारों, व्यापारियों और शहरों के प्रतिष्ठित लोगों के बीच लोकप्रिय होता गया। उस दौर में ब्रिज महज खेल नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और बौद्धिक कौशल का प्रतीक माना जाता था। बड़े क्लबों, ऑडिटोरियम और निजी महफिलों में इसके मुकाबले आयोजित होते थे, जहां लोग घंटों बैठकर अपनी रणनीति के दम पर बाजी जीतने की कोशिश करते थे।

स्वतंत्रता से पहले के भारत में ब्रिज खेलना एक प्रतिष्ठित शौक समझा जाता था। शहरों के नामचीन लोग शाम के वक्त क्लबों और सैलूनों में जुटते थे, जहां ताश की बाजियों के बीच चर्चाएं भी होती थीं।

1934 का टूर्नामेंट और एक रुपये की एंट्री फीस

दीवान बहादुर राधाकृष्ण जालान के संग्रह में मौजूद दस्तावेज के मुताबिक 1934 में पटना सिटी ब्रिज टूर्नामेंट का आयोजन हुआ था, जिसमें खुद राधाकृष्ण जालान ने भी हिस्सा लिया था। ब्रिज खेलते हुए उनकी तस्वीर आज भी मौजूद है।

इस टूर्नामेंट के सफल आयोजन के लिए कई नियम बनाए गए थे। जैसे, इसमें केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पुरुष और महिलाएं ही भाग ले सकते थे। साथ ही प्रतिभागी का पटना सिटी नगरपालिका या पटना प्रशासनिक क्षेत्र का निवासी होना भी जरूरी था। इसके लिए प्रवेश शुल्क 1 रुपये तय किया गया था।

साथी का चयन खुद, पर बीच में बदलाव की मनाही

टूर्नामेंट अलग-अलग चरणों में खेला जाता था और हर मुकाबले के लिए तय संख्या में बाजियां रखी जाती थीं। जो टीम सबसे ज्यादा अंक हासिल करती थी, उसे विजेता घोषित किया जाता था। खेल अंतरराष्ट्रीय ब्रिज नियमों के अनुसार संचालित होता था।

भाग लेने के लिए खिलाड़ियों को निर्धारित तिथि तक आवेदन देना और प्रवेश शुल्क जमा करना पड़ता था। हर खिलाड़ी अपने साथी का चयन खुद करता था, लेकिन एक बार टीम बनने के बाद पूरे टूर्नामेंट में वही जोड़ी साथ खेलती थी। बीच में साथी बदलने की अनुमति नहीं थी।

समय पर न पहुंचने पर मान ली जाती थी हार

मुकाबलों की तारीख और समय पहले से तय कर दिए जाते थे। किसी टीम के समय पर न पहुंचने पर उसे हार का सामना करना पड़ सकता था। हालांकि विशेष परिस्थितियों में आयोजकों की अनुमति से मैच की तारीख आगे बढ़ाई जा सकती थी।

टूर्नामेंट के दौरान दर्शकों को मौजूद रहने की इजाजत थी, लेकिन वे खेल में किसी भी तरह का दखल नहीं दे सकते थे। अगर कोई दर्शक खिलाड़ियों को प्रभावित करने या खेल में हस्तक्षेप करने की कोशिश करता, तो उसे वहां से जाने के लिए कह दिया जाता था।

सबसे रोचक बात यह है कि उस दौर में भी नियमों के पालन को लेकर खासी गंभीरता बरती जाती थी। विवाद की स्थिति में निर्णायक या अध्यक्ष का फैसला अंतिम माना जाता था। इससे साफ झलकता है कि करीब 90 साल पहले पटना में ताश सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनुशासित और प्रतिष्ठित प्रतियोगिता के रूप में खेला जाता था।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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