झारखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
झारखंड का बेतला नेशनल पार्क आज देश और विदेश से आने वाले सैलानियों के लिए एक खास ठिकाना बन चुका है। घने जंगल, वन्यजीवों की मौजूदगी और जंगल सफारी का रोमांच हर साल हजारों पर्यटकों को यहां खींच लाता है। मगर यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि भारत में व्यवस्थित ढंग से जंगल सफारी और वन्यजीव पर्यटन की शुरुआत बेतला से ही हुई थी। यही वजह है कि इसे देश में वन्यजीव पर्यटन की ऐतिहासिक और शुरुआती जगहों में गिना जाता है।
जब रखी गई पर्यटन की नई सोच की नींव
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव बताते हैं कि वर्ष 1966 के आसपास बेतला में जंगल पर्यटन की एक नई अवधारणा पर काम शुरू हुआ था। उस दौर में यहां का जंगल वन्यजीवों से भरा-पूरा था। बाघ, हिरण, भालू और कई दुर्लभ प्रजातियों के जानवर बड़ी तादाद में यहां पाए जाते थे। इसी वजह से यह इलाका ‘टाइगर कंट्री’ के नाम से भी पहचाना जाता था।
अधिकारियों की पहल से शुरू हुई सफारी
तत्कालीन वन अधिकारी एस.पी. शाही, जे. मिश्रा और आर.सी. सहाय ने यह विचार आगे बढ़ाया कि आम लोगों को जंगल और वन्यजीवों से जोड़ने के लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए। इसके बाद बेतला में योजना के तहत जंगल सफारी की शुरुआत की गई। जंगल के भीतर सड़कें बनाई गईं और उनके आसपास घास के मैदान तैयार किए गए, ताकि पर्यटक आसानी से जानवरों को निहार सकें।
वॉच टावर और रोमांचक सफर
पर्यटकों की सहूलियत के लिए बैगापानी, हतबजवा, मधुचुआं और चतुर्भथवा जैसे स्थानों पर वॉच टावर भी खड़े किए गए। यहां से लोग सुरक्षित ढंग से जंगली जानवरों को देख सकते थे और उनकी तस्वीरें भी ले सकते थे। उस समय यह सफारी मुख्य गेट से शुरू होकर बाघ केव तक जाती थी और करीब पांच से छह किलोमीटर का यह सफर बेहद रोमांचक माना जाता था।
दो हथिनियां और मामूली शुल्क
वन विभाग ने उस वक्त गाइड, कैंटीन और निजी वाहनों की एंट्री जैसी सुविधाएं भी शुरू की थीं। सफारी के लिए महज 20 से 25 रुपये शुल्क लिया जाता था। इसके साथ ही सोनपुर मेले से ‘जूही’ और ‘अनारकली’ नाम की दो हथिनियों को भी यहां लाया गया था, जिन पर बैठकर पर्यटक जंगल की सैर का आनंद लेते थे।
सिर्फ नेशनल पार्क नहीं, एक प्रयोगशाला
डॉ. श्रीवास्तव का कहना है कि बेतला महज एक नेशनल पार्क नहीं, बल्कि भारत में जंगल सफारी और वन्यजीव प्रबंधन की शुरुआती प्रयोगशाला रहा है। आज देश के कई नेशनल पार्कों में जो पर्यटन मॉडल नजर आता है, उसकी बुनियाद दशकों पहले बेतला की धरती पर ही पड़ी थी। यही कारण है कि बेतला आज भी झारखंड की वन्यजीव विरासत का एक गौरवशाली अध्याय माना जाता है।
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