झारखंड
एक घंटा पहले
4
विचारों
साहित्य के प्रति बचपन से था गहरा लगाव
हिंदी भाषा के प्रति अथाह प्रेम और गहरा जुड़ाव पलामू के रहने वाले हरिवंश प्रभात को साहित्य की दुनिया के एक अहम मुकाम तक ले आया है। बचपन के दिनों से ही उन्हें हिंदी कविताओं में काफी रुचि थी। वे न केवल बड़े चाव से कविताओं को पढ़ा करते थे, बल्कि कई कालजयी रचनाएं तो उन्हें पूरी तरह कंठस्थ भी थीं। यह स्वाभाविक रुचि ही आगे चलकर उनके साहित्यिक जीवन की मजबूत बुनियाद साबित हुई।
व्याकरण को बनाया बच्चों के लिए खेल
हरिवंश प्रभात की साहित्यिक यात्रा की सबसे खास और उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने बच्चों को जटिल विषय सिखाने के लिए बेहद सरल शैली अपनाई है। उन्होंने हिंदी और संस्कृत व्याकरण के उन कठिन नियमों को चुना, जिन्हें पढ़ना छात्रों के लिए अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है, और उन्हें मजेदार कविताओं तथा लयबद्ध पंक्तियों में पिरो दिया। उनका मानना है कि जब बच्चे किसी विषय को लय और छंद के साथ सीखते हैं, तो वह उनके दिमाग में स्थायी रूप से बैठ जाता है। इसी विचार को धरातल पर उतारते हुए उन्होंने कई ऐसी पुस्तकें तैयार की हैं जो सीधे विद्यार्थियों की जरूरतों को पूरा करती हैं।
सरल उदाहरणों से मिलती है सीखने में मदद
अपनी किताबों के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने व्याकरण के मुख्य और कठिन बिंदुओं को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। उदाहरण के लिए, वे वाक्य की परिभाषा को एक कविता की तरह समझाते हैं। वे लिखते हैं कि 'जिसके कहने से सुनने वाला पूरी बात समझता है, वाक्य उसे कहते हैं, जैसे काला मेघ बरसता है।' इस प्रकार की रचनात्मक और सरल शैली बच्चों के लिए व्याकरण को किसी बोझिल विषय के बजाय एक आनंददायक अनुभव में बदल देती है।
अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं 12 पुस्तकें
हरिवंश प्रभात ने अपने लेखन सफर के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वे अब तक हिंदी भाषा में कुल 12 पुस्तकें लिख चुके हैं। उनकी प्रमुख और चर्चित कृतियों में गीत और कविताओं के साथ बढ़ते चरण, बूंद-बूंद सागर, गिरा नहीं अभी घरौंदा है, हिंदी व्याकरण एवं रचना और आओ भाषा सीखें जैसी महत्वपूर्ण किताबें शामिल हैं। उनकी रचनाओं में साहित्य का आनंद तो मिलता ही है, साथ ही शिक्षा को सरल बनाने का एक बड़ा उद्देश्य भी स्पष्ट रूप से झलकता है।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से मिल चुकी है पहचान
हिंदी साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें समय-समय पर अनेक बड़े सम्मानों से नवाजा गया है। वर्ष 2019 में दिल्ली के मंच से उन्हें प्रतिष्ठित झारखंड रत्न सम्मान प्रदान किया गया। इसके बाद वर्ष 2021 में पटना स्थित बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया। इसी वर्ष उन्हें बिरसा मुंडा ज्योति सम्मान से भी अलंकृत किया गया। बच्चों को कविता के माध्यम से हिंदी और व्याकरण की बारीकियां सिखाने की उनकी इस सार्थक पहल ने पलामू की साहित्यिक पहचान को न केवल राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती दी है, बल्कि राज्य को गौरवान्वित भी किया है।
Comments
0 comment