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2 दिन पहले
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अमेरिका और ईरान के बीच लंबे टकराव की आग अब बुझती दिखाई दे रही है और दोनों देशों के बीच शांति समझौते का रास्ता खुलता नजर आ रहा है। पूरी दुनिया की निगाहें वॉशिंगटन और तेहरान पर टिकी रहीं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक तीसरा किरदार भी रहा जिसने दोनों पक्षों के बीच फायदा उठाया। वह देश है पाकिस्तान।
इस्लामाबाद में हुई बातचीत से लेकर जून 2026 के समझौते तक पाकिस्तान लगातार मध्यस्थ की भूमिका में नजर आया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सबसे पहले इस समझौते की घोषणा की, इसके बाद ट्रंप ने भी इसकी पुष्टि की और फिर ईरानी अधिकारियों ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की तारीफ की। लेकिन असली सवाल यह है कि इस पूरी कवायद से पाकिस्तान को आखिर हासिल क्या होगा।
कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान को राहत
कूटनीतिक स्तर पर देखें तो पाकिस्तान को बड़ी राहत मिली है। बीते कई वर्षों से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहे इस देश को पहली बार किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में मध्यस्थ के रूप में देखा गया है। अमेरिका और ईरान जैसे एक-दूसरे के विरोधी देशों के बीच पुल बनने से उसे साख का फायदा मिला है। हालांकि उसकी इस मध्यस्थता का असली इनाम कुछ और ही हो सकता है।
दरअसल, इस समझौते के बाद पाकिस्तान की नजर उस परियोजना पर जा टिकी है जो तीन दशक से अधिक समय से अधूरी पड़ी हुई है। यह है ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन, जिसे कभी पाकिस्तान की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा माना जाता था।
क्या है ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन
इस परियोजना की कहानी कोई नई नहीं है। 1990 के दशक में ईरान, पाकिस्तान और भारत को आपस में जोड़ने वाली एक पाइपलाइन की कल्पना की गई थी। बाद में भारत इस योजना से अलग हो गया और यह केवल ईरान-पाकिस्तान पाइपलाइन बनकर रह गई। योजना यह थी कि ईरान के विशाल गैस भंडार से पाकिस्तान को प्राकृतिक गैस मिलेगी, जिससे उसके उद्योग चलेंगे, बिजली बनेगी और ऊर्जा संकट में कमी आएगी।
लेकिन अमेरिका के प्रतिबंध इस परियोजना की राह में रुकावट बने रहे। ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के चलते पाकिस्तान लगातार दबाव में रहा और अपने हिस्से में बनने वाली पाइपलाइन को आगे नहीं बढ़ा सका। दूसरी ओर ईरान अपनी तरफ का बड़ा हिस्सा पहले ही तैयार कर चुका है।
पाकिस्तान को कैसे होगा फायदा
अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले समझौतों में तेल प्रतिबंधों में राहत, आर्थिक सहयोग और आगे परमाणु वार्ता जैसे बिंदु शामिल हैं। अगर अगले 60 दिनों में होने वाली बातचीत कामयाब रहती है और प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो पाकिस्तान के लिए पाइपलाइन परियोजना को दोबारा शुरू करने का रास्ता खुल सकता है।
पाकिस्तान के लिए यह महज एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना नहीं है। वह लंबे समय से ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। वहां बिजली उत्पादन महंगा है, गैस की किल्लत बनी रहती है और विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयात पर खर्च हो जाता है। ईरान से सस्ती पाइपलाइन गैस मिलने पर पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बच सकता है।
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