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एक घंटा पहले
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अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों का कड़वा सच
अमेरिकी पत्रिका द नेशनल इंटरेस्ट ने हाल ही में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें अमेरिका और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे जटिल संबंधों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में एक बड़ा दावा करते हुए कहा गया है कि अमेरिका ने लंबे समय तक यह बड़ी भूल की है कि वह पाकिस्तान को खरीद सकता है या उसे अपना स्थायी सहयोगी बना सकता है। लेख के अनुसार, हकीकत यह है कि पाकिस्तान कभी बिकने वाली वस्तु नहीं रहा है, बल्कि वह हमेशा से 'किराए पर उपलब्ध' रहने वाला एक देश है। यह देश अपनी सुविधा और जरूरतों के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय शक्तियों को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने में माहिर है।
किराए का पार्टनर और कूटनीतिक चालें
विश्लेषण में स्पष्ट किया गया है कि पाकिस्तान किसी भी देश का स्थायी साथी बनने के बजाय स्थिति के अनुसार अपनी निष्ठा बदलता रहता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान समय की मांग और अपने राष्ट्रीय लाभ के हिसाब से दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ काम करता है। यही कारण है कि उसे एक ऐसा देश माना गया है जो बिकता नहीं है, बल्कि किराए पर अपनी सेवाएं प्रदान करता है। उदाहरण के तौर पर, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव के दौरान पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और तनाव कम करने के लिए जो भूमिका पाकिस्तान ने निभाई, वह काम अमेरिका के पारंपरिक और पुराने सहयोगी जैसे कि फ्रांस, जर्मनी या ब्रिटेन करने में सक्षम नहीं थे। पाकिस्तान के पास दोनों पक्षों से संबंध बनाए रखने की वह कूटनीतिक पहुंच है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी जरूरत के अनुसार करता है।
चीन और पश्चिम के बीच दोहरा फायदा
पाकिस्तान अपनी विदेश नीति को रक्षा और व्यापार के स्तर पर इस तरह संतुलित करता है कि उसे दोनों तरफ से लाभ मिलता रहे। रिपोर्ट में अजरबैजान के साथ हुए 4.6 अरब डॉलर के एक बड़े रक्षा समझौते का विशेष उल्लेख किया गया है। इस सौदे के तहत पाकिस्तान, अजरबैजान को 40 जेएफ-17 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति करने वाला है। इस विमान की तकनीकी जटिलता का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि इसमें चीनी तकनीक, रूसी इंजन और पाकिस्तानी निर्माण का एक अनूठा मिश्रण शामिल है। यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान किस प्रकार चीन के साथ अपने गहरे संबंधों का लाभ उठाकर अन्य देशों के साथ रक्षा सौदे करने में सफल हो रहा है।
आर्थिक लाभ की हवस
रिपोर्ट का दावा है कि ईरान संकट के दौरान मध्यस्थता करने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने आर्थिक मदद की मांग भी रखी। इस्लामाबाद ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए 10 अरब डॉलर का एक एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फंड बनाने का प्रस्ताव अमेरिका के समक्ष रखा था। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान अपनी रणनीतिक अहमियत का उपयोग सीधे तौर पर आर्थिक फायदे हासिल करने के लिए कर रहा है, जबकि साथ ही वह चीन के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी मजबूत बनाए हुए है।
अमेरिका को क्या करना चाहिए?
द नेशनल इंटरेस्ट का मानना है कि अमेरिका को पाकिस्तान पर चीन से रिश्ते पूरी तरह समाप्त करने का दबाव नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना पाकिस्तान के लिए व्यावहारिक नहीं है। इसके बजाय, अमेरिका को अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है। वाशिंगटन को यह सुनिश्चित करना होगा कि चीन का पाकिस्तान पर पूरी तरह से एकाधिकार न हो जाए। अमेरिका को अपने आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक प्रभाव का चतुराई से उपयोग करना चाहिए ताकि पाकिस्तान उसके हितों के दायरे में बना रहे। रिपोर्ट के मुताबिक, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अमेरिका का प्रभाव आज भी बहुत गहरा है, और इन मंचों के माध्यम से अमेरिका पाकिस्तान पर अपना कूटनीतिक दबाव बनाए रख सकता है।
निष्कर्ष
अंत में, रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान की पूरी विदेश नीति का एकमात्र उद्देश्य किसी एक खेमे का साथ देना नहीं है। इसके विपरीत, पाकिस्तान अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने संबंधों को बनाए रखकर अधिक से अधिक लाभ अर्जित करना चाहता है। यही वजह है कि इसे दुनिया के मंच पर एक ऐसे रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा जा रहा है जो बिकाऊ नहीं, बल्कि किराए पर उपलब्ध है।
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