ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप के सामने दोहरी चुनौती, इजरायल और सऊदी अरब के अलग-अलग रुख से बढ़ी उलझन विश्व एक घंटा पहले 6
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के मुद्दे पर अपने दो अहम सहयोगियों इजरायल और सऊदी अरब के बीच फंसते नजर आ रहे हैं, जहां एक ओर इजरायल सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है तो वहीं सऊदी अरब संयम बरतने की सलाह दे रहा है।

ईरान संकट पर डोनाल्ड ट्रंप के सामने बढ़ती मुश्किलें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों ईरान के साथ बढ़ते गतिरोध को लेकर एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। राष्ट्रपति के सामने इस समय एक ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें अपने दो सबसे भरोसेमंद सहयोगी देशों के बीच ला खड़ा किया है। एक तरफ इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हैं जो ईरान पर और अधिक आक्रामक रुख अपनाने की वकालत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का संदेश है जो क्षेत्र में जारी तनाव को कम करने का आग्रह कर रहा है। व्हाइट हाउस के भीतर इस हफ्ते हुई बैठकों ने स्थिति की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।

इजरायल और सऊदी अरब की विरोधाभासी सलाह

व्हाइट हाउस में दो दिनों तक चली उच्च स्तरीय बैठकों के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप से स्पष्ट कहा कि ईरान के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। नेतन्याहू का मानना है कि ईरान पर दबाव की नीति को और अधिक कड़ा करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, यदि परिस्थितियां मांग करती हैं तो अमेरिका को बड़े सैन्य अभियान पर भी विचार करना चाहिए। इसके ठीक उलट, अगले ही दिन व्हाइट हाउस पहुंचे सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का संदेश डोनाल्ड ट्रंप तक पहुँचाया। सऊदी नेतृत्व का स्पष्ट मानना है कि तनाव को कम करने के प्रयास किए जाने चाहिए क्योंकि लंबी सैन्य जंग का खामियाजा पूरे पश्चिम एशिया को भुगतना पड़ सकता है। इस दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी मौजूद थे, जिन्हें सऊदी अरब ने संयम बनाए रखने की सलाह दी।

अमेरिका में साइबर हमले का खतरा

इस कूटनीतिक खींचतान के बीच ईरान की ओर से अमेरिका को एक नया और बड़ा झटका लगा है। हाल ही में अमेरिका के महत्वपूर्ण वाटर सप्लाई सिस्टम और प्लांट्स को बड़े पैमाने पर साइबर हमलों का निशाना बनाया गया है। सरकारी बुनियादी ढांचे से जुड़ी करीब 7 जगहों पर हुए इन हमलों के कारण स्थिति इतनी विकट हो गई कि कई राज्यों को एहतियात के तौर पर अपने ऑटोमैटिक सिस्टम को बंद करना पड़ा और अधिकारियों को मैनुअल तरीके से काम संभालना पड़ा। इस हमले का पहला पता 26 और 27 जुलाई के बीच चला, जब मिनेसोटा राज्य में 30 से ज्यादा कम्युनिटी वाटर सिस्टम्स को हैकर्स ने अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की। मिनेसोटा आईटी सर्विसेज की जांच में यह खुलासा हुआ कि किसी ने जानबूझकर पानी की आपूर्ति नियंत्रित करने वाले डिजिटल ढांचे का एक्सेस हासिल कर लिया था। हालांकि पूरी दुनिया इस हमले के पीछे ईरान का हाथ होने का शक जता रही है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप अभी सार्वजनिक रूप से ईरान का नाम लेने से बच रहे हैं।

बातचीत की संभावना और सैन्य विकल्पों की तैयारी

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच तत्काल सीधी बातचीत शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं है। ट्रंप भले ही यह दावा करते रहे हों कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को रिपोर्ट मिली है कि ईरान का शक्तिशाली सैन्य समूह अभी भी हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दबाव बनाने और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले जारी रखने की अपनी पुरानी रणनीति पर टिका हुआ है। ईरान के इस रवैये से डोनाल्ड ट्रंप खासे नाराज बताए जा रहे हैं, जिसके चलते उन्होंने हाल ही में कैंप डेविड में कैबिनेट की एक विशेष बैठक बुलाई थी। बैठक में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उन्हें सिर्फ जीत चाहिए। उन्होंने कहा कि भले ही स्थिति कभी उतार-चढ़ाव भरी रहे, लेकिन अंत में ईरान की ताकत समाप्त हो जाएगी।

कूटनीतिक स्तर पर कोशिशें धीमी पड़ती देख अमेरिका अब सैन्य विकल्पों को भी गंभीरता से देख रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाते हुए एक से दो हफ्ते तक चलने वाले हवाई हमलों की योजना तैयार कर ली है। हालांकि अंतिम निर्णय डोनाल्ड ट्रंप को लेना है, लेकिन सेना के आला अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि केवल हवाई हमले से किसी देश पर कब्जा संभव नहीं है। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने सांसदों को सूचित किया कि एयर पावर की भी अपनी सीमाएं होती हैं। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि अमेरिका के एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से घट रहा है। इसके अलावा, ईरान के बिजली, पानी और अन्य बुनियादी ढांचे पर हमले से बड़ी संख्या में आम नागरिकों के मारे जाने का खतरा भी बना हुआ है। इस पर डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य आम जनता को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

हॉर्मुज और घरेलू राजनीति पर दबाव

वर्तमान संकट में सबसे बड़ी चिंता का विषय हॉर्मुज जलडमरूमध्य है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। अमेरिका में ईरान के साथ खिंचते संघर्ष का असर घरेलू राजनीति पर भी पड़ रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि यदि हॉर्मुज में तनाव जारी रहा तो वैश्विक बाजार में तेल और ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका सीधा असर अगले साल होने वाले मिडटर्म चुनावों पर पड़ेगा। एक हालिया सीएनएन सर्वे के मुताबिक, मात्र 28 प्रतिशत अमेरिकी ही ईरान के साथ जारी इस संघर्ष को संभालने के डोनाल्ड ट्रंप के तरीके से संतुष्ट नजर आते हैं।

ईरान के भीतर सत्ता का टकराव

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान के आंतरिक राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। वहां सत्ता को लेकर अब पहले से कहीं ज्यादा खींचतान देखी जा रही है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का प्रभाव बढ़ने से अब अमेरिका के लिए यह समझना भी मुश्किल हो गया है कि ईरान में वास्तविक फैसले कौन ले रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं स्वीकार किया कि अब स्थिति बहुत जटिल हो गई है क्योंकि पहले जिन लोगों से उनकी बातचीत हो रही थी, अब वहां हालात बदल गए हैं। लोग बातचीत के लिए तैयार तो होते हैं लेकिन अपने वादे से मुकर जाते हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए झुंझलाहट का कारण बन रहा है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि डोनाल्ड ट्रंप अंततः इजरायल और सऊदी अरब के बीच जारी इस कूटनीतिक संघर्ष में क्या रास्ता चुनते हैं।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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