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एक घंटा पहले
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पाकिस्तान का नया रक्षा दांव
लगातार गहरे आर्थिक संकट और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रहे पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना समर्थन आधार बढ़ाने के लिए एक बार फिर मुस्लिम देशों का रुख किया है। सऊदी अरब और तुर्की के साथ गहरे सैन्य और आर्थिक संबंधों के बाद, अब पाकिस्तान ने कुवैत के साथ एक महत्वपूर्ण सैन्य सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते को इस्लामाबाद में कुवैत के रक्षा मंत्री शेख अब्दुल्ला अली और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की मुलाकात के दौरान अंतिम रूप दिया गया। कंगाली के इस दौर में, पाकिस्तान लगातार अमीर मुस्लिम देशों के चक्कर काटने को मजबूर है ताकि उसे किसी तरह की वित्तीय या सैन्य मदद मिल सके। इस बार कुवैत को अपने सुरक्षा घेरे में लेकर पाकिस्तान ने अपनी कूटनीति को नया आयाम देने की कोशिश की है।
समझौते के पीछे की आधिकारिक कहानी
कुवैती रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, कुवैत और पाकिस्तान ने अपने रक्षा संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए जॉइंट डिफेंस एंड मिलिट्री कोऑपरेशन एग्रीमेंट साइन किया है। यह समझौता कुवैत के रक्षा मंत्री शेख अब्दुल्ला अली अब्दुल्ला अल-सालेम अल-सबाह की इस्लामाबाद यात्रा का परिणाम है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ के साथ हुई इस हाई-लेवल बैठक में दोनों देशों ने रक्षा और सैन्य सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारियों के मुताबिक, दोनों नेताओं ने न केवल अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर बात की, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के ज्वलंत मुद्दों पर भी अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। कुवैती सेना ने इस करार को एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए इसे दोनों देशों के बीच रक्षा तालमेल बढ़ाने की दिशा में एक बड़ी पहल करार दिया है।
सैन्य सहयोग का असली एजेंडा
हालाँकि यह डील रक्षा और सैन्य तालमेल के नाम पर हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे पाकिस्तान के असली मकसद पूरी तरह से आर्थिक हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से वेंटिलेटर पर है और वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।
- आर्थिक निवेश और वित्तीय मदद: पाकिस्तान की नजर कुवैत के विशाल पेट्रो-डॉलर पर टिकी है। इस डील के जरिए पाकिस्तान को उम्मीद है कि उसे कुवैत से रियायती दरों पर तेल मिल सकेगा और निवेश की नई संभावनाएं खुलेंगी।
- नौकरियों का सृजन: कुवैत की सेना को अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कुशल मैनपावर की जरूरत होती है। इस समझौते के जरिए पाकिस्तानी सैनिकों और पूर्व सैन्य अधिकारियों के लिए कुवैत में रक्षा प्रशिक्षण और अन्य संबंधित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
- विदेशी मुद्रा की प्राप्ति: कुवैत में पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों की तैनाती और उनके माध्यम से आने वाली विदेशी मुद्रा पाकिस्तान के गिरते विदेशी मुद्रा भंडार को राहत देने का एक बड़ा जरिया बन सकती है।
कुवैत के लिए इस सौदे का महत्व
दूसरी ओर, कुवैत एक छोटा लेकिन बेहद समृद्ध राष्ट्र है जिसकी अपनी सेना का आकार सीमित है। पाकिस्तान के साथ यह समझौता कुवैत को रक्षा तैयारियों और इंटेलिजेंस शेयरिंग के क्षेत्र में एक अनुभवी साझेदार उपलब्ध कराता है। पाकिस्तान की विशाल सेना का अनुभव और जमीनी स्तर पर प्रशिक्षित सैन्य बल कुवैत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित हो सकते हैं। यह डील कुवैत के लिए रक्षा तंत्र को आधुनिक बनाने और मैनपावर की कमी को दूर करने का एक सस्ता और प्रभावी विकल्प है।
पाकिस्तान की कूटनीति और भविष्य
पाकिस्तान इस समझौते के माध्यम से दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि मुस्लिम जगत में उसकी सैन्य साख अभी भी बरकरार है। अंतरराष्ट्रीय अलगाव के डर से बचने और आर्थिक बदहाली को छिपाने के लिए पाकिस्तान के लिए ऐसे सैन्य समझौते एक ढाल की तरह काम करते हैं। सऊदी अरब और तुर्की पहले से ही पाकिस्तान की सैन्य और वित्तीय मदद के लिए बड़े स्तंभ रहे हैं, और अब कुवैत को इस फेहरिस्त में जोड़कर पाकिस्तान अपनी डूबती नैया को सहारा देने की कोशिश कर रहा है। देखना अब यह है कि यह नया ‘खंभा’ पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को वास्तव में मजबूती प्रदान कर पाता है या फिर यह समझौता केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा। पाकिस्तान की पूरी रणनीति अब इस बात पर टिकी है कि कैसे सैन्य साख का इस्तेमाल करके आर्थिक लाभ वसूला जाए।
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