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एक घंटा पहले
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विचारों
पाकिस्तान को 1971 के मुक्ति युद्ध में मिली हार को पचास साल से ज़्यादा बीत चुके हैं, फिर भी ढाका में इस्लामाबाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं। बीते महीनों में दोनों देशों के राजनयिक रिश्ते भले गहरे हुए हों, मगर खुफिया सूत्रों और सुरक्षा विश्लेषकों ने बांग्लादेश के भीतर और बाहर सक्रिय पाकिस्तान-समर्थित नेटवर्क की गतिविधियों पर संगीन आरोप लगाए हैं। इनमें सबसे चिंताजनक दावा “संगठित मानव अंग तस्करी” का है, जिसमें बांग्लादेश के कमज़ोर तबके के लोगों को निशाना बनाए जाने की बात कही जा रही है।
1971 की हार और लंबे समय की कसक
1971 में पाकिस्तान की पराजय दक्षिण एशिया के इतिहास की सबसे अहम घटनाओं में गिनी जाती है। बहुत-से बांग्लादेशियों के लिए मुक्ति युद्ध उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध राष्ट्रीय आत्मनिर्णय की विजय का प्रतीक है। पाकिस्तान के लिए यह सैन्य हार केवल रणनीतिक धक्का नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था पर गहरी चोट थी। कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि पाकिस्तान के भीतर कुछ तत्व लंबे अरसे से बांग्लादेश में अपना दबदबा दोबारा कायम करने और क्षेत्रीय समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के मौके तलाशते रहे हैं।
नौकरी का लालच और लाहौर तक का सफर
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के संरक्षण में चलने वाले कथित अंग तस्करी नेटवर्क बांग्लादेशी नागरिकों को प्रति माह 750 अमेरिकी डॉलर तक वेतन वाली नौकरी का लालच देकर फंसा रहे हैं। पीड़ितों को लाहौर ले जाया जाता है, जहां झूठे बहाने बनाकर उनकी मेडिकल जांच करवाई जाती है।
सूत्रों के आरोप के मुताबिक, लाहौर पहुंचते ही पीड़ितों को सीधे निजी क्लिनिकों में ले जाया जाता है और उन्हें यह सामान्य मेडिकल चेकअप बताया जाता है। वहां उन्हें बेहोश कर एक गुर्दा (किडनी) गैरकानूनी ढंग से निकाल लिया जाता है। जब उन्हें इस धोखे का पता चलता है, तब तक उन्हें अलग-अलग सुरक्षित ठिकानों पर बंद रखा जाता है और बाद में बांग्लादेश वापस भेज दिया जाता है। रिहा करने से पहले दबाव डालकर उनसे ऐसे दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं, जिनमें लिखा होता है कि उन्होंने अपने रिश्तेदार को अपनी मर्ज़ी से गुर्दा दान किया है।
चार नेटवर्क और एक मुखौटा कंपनी
बांग्लादेश के चर्चित न्यूज़ पोर्टल वीकली ब्लिट्ज के संपादक शोएब चौधरी ने बताया कि बांग्लादेशी नागरिकों की भर्ती में कम से कम तस्करी के चार नेटवर्क सक्रिय हैं। बांग्लादेश के राजनयिक मिशन से मिली सूचना के आधार पर लाहौर पुलिस ने एक ऐसे नेटवर्क की पहचान की है, जो ज़ाकिर ट्रेडर्स (प्राइवेट) लिमिटेड नामक ट्रेडिंग कंपनी की आड़ में काम कर रहा है। बताया जाता है कि इस कंपनी पर पाकिस्तानी नागरिक ज़ाकिर हुसैन का मालिकाना हक है और यह खुद को बांग्लादेशी मरीज़ों के लिए मेडिकल सेवाएं उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में पेश करती है।
चौधरी के मुताबिक, लाहौर के कुछ अस्पताल और निजी क्लिनिक तस्करी नेटवर्क द्वारा फर्जी दस्तावेज़ और मंज़ूरी हासिल कर लेने के बाद गैरकानूनी अंग प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) की प्रक्रिया अंजाम देते हैं। कुछ पीड़ितों को वैध इलाज का बहाना बनाकर मेडिकल सुविधाओं में भर्ती किया जाता है, जबकि अंग प्रत्यारोपण से जुड़े कानूनी और नैतिक नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाता है।
एक पीड़ित की आपबीती
शोएब चौधरी ने एक पीड़ित का ज़िक्र करते हुए बताया कि मगुरा ज़िले के शालिखा उपज़िला के अरपाड़ा गांव के रहने वाले मीर ताल्हा जुबैर आदनान ने लाहौर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने एमडी ज़ाकिर हुसैन नामक व्यक्ति पर आरोप लगाया कि रोज़गार के नाम पर उन्हें पाकिस्तान ले जाया गया, जहां मरीज़-देखभाल करने वाले के तौर पर काम देने का वादा किया गया था।
शिकायत के अनुसार, वहां पहुंचने पर उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया गया और गुर्दा दान करने का दबाव डाला गया। आदनान का यह भी आरोप है कि गुर्दे के बदले उन्हें 5 लाख बांग्लादेशी टका देने का वादा किया गया था। ऐसी ही शिकायतें अन्य बांग्लादेशी नागरिकों ने भी दर्ज कराई हैं, हालांकि सूत्रों का कहना है कि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
अंतरराष्ट्रीय कानूनों की नज़र में गंभीर अपराध
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन मानव अंग तस्करी को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन और संगीन अंतरराष्ट्रीय अपराध मानते हैं। कई देशों के अंतरराष्ट्रीय समझौते और घरेलू कानून मानव अंगों के व्यापार पर सख़्त रोक लगाते हैं और इसमें शामिल लोगों के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान रखते हैं।
एचआईवी फैलाने का खतरनाक आरोप
सूत्रों ने आईएसआई के सहयोग से पाकिस्तानी अपराधी नेटवर्क द्वारा चलाए जा रहे एक और भी खतरनाक ऑपरेशन को लेकर आशंका जताई है। इनके अनुसार, पर्यटन, रोज़गार या अन्य कामों से पाकिस्तान जाने वाले कुछ बांग्लादेशी नागरिकों को विभिन्न धोखाधड़ी भरे तरीकों से, खासकर मेडिकल जांच और पैथोलॉजिकल टेस्ट के दौरान, एचआईवी वायरस से संक्रमित कर दिया जाता है।
आरोप है कि अपराधी मुख्य रूप से युवा पुरुषों को निशाना बनाते हैं और संक्रमण के बाद उन्हें बांग्लादेश लौटने दिया जाता है। बताया जाता है कि इस साज़िश का मकसद बांग्लादेशी समाज के अलग-अलग वर्गों, खासकर ग्रामीण इलाकों में धीरे-धीरे एचआईवी फैलाना है। हालांकि इन दावों की गहन जांच और स्वतंत्र सत्यापन ज़रूरी है।
ढाका में आईएसआई सेल का संदिग्ध
मिली जानकारी के अनुसार, बांग्लादेश पुलिस द्वारा जारी फुटेज में पाकिस्तानी आईएसआई के ढाका सेल का एक सदस्य बताए गए व्यक्ति को राजधानी में सिविल नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिल पर चलते हुए पकड़ा गया। राजनयिक मिशन से जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा सिविल नंबर प्लेट के इस्तेमाल ने उसकी गतिविधियों की प्रकृति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खुफिया सूत्रों का मानना है कि यह गुप्त आवाजाही अंग तस्करी नेटवर्क की गतिविधियों को सुविधा पहुंचाने से जुड़ी हो सकती है।
दिसंबर 2024 से बढ़ते मामले
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दिसंबर 2024 से अज्ञात संख्या में बांग्लादेशी नागरिक कथित अंग तस्करी नेटवर्क का शिकार बने हैं, जिनके गुर्दे गैरकानूनी ढंग से निकाले गए, जबकि कुछ को संबंधित अपराधी गतिविधियों के ज़रिए एचआईवी संक्रमण का शिकार बनाया गया। इन आरोपों का पूरा दायरा अभी स्पष्ट नहीं है और संबंधित अधिकारियों द्वारा तुरंत जांच की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती
यह मुद्दा अगस्त 2024 के राजनीतिक बदलावों के बाद बांग्लादेश-पाकिस्तान संबंधों में आए परिवर्तन की पृष्ठभूमि में सामने आया है। अगर अंग तस्करी, गैरकानूनी मेडिकल प्रक्रियाओं और अन्य अंतरराष्ट्रीय अपराधी गतिविधियों से जुड़े ये आरोप साबित होते हैं, तो ये महज़ अलग-अलग अपराध नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के लिए बड़ी चुनौती साबित होंगे।
सरकार, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और क्षेत्रीय साझेदारों को इन दावों की तत्काल जांच करनी चाहिए, दोषियों की शिनाख्त करनी चाहिए और जवाबदेही तय करनी चाहिए। निर्णायक कदम न उठाए जाने से नागरिकों का शोषण और बढ़ सकता है तथा क्षेत्रीय सुरक्षा एवं स्थिरता और कमज़ोर पड़ सकती है।
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