चीन का पाकिस्तान प्लान क्यों हो रहा फेल, बलूचिस्तान की हिंसा में कैसे फंसा ड्रैगन का अरबों डॉलर का सपना विश्व एक महीने पहले 58
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बढ़ती अस्थिरता और हिंसा ने चीन के महत्वाकांक्षी सीपीईसी (CPEC) प्रोजेक्ट को गहरे संकट में डाल दिया है। ग्वादर बंदरगाह से लेकर खदानों तक, चीनी निवेश अब सुरक्षा चुनौतियों के साये में है।

बलूचिस्तान में गहराता सुरक्षा संकट और चीन के बढ़ते निवेश पर तलवार

पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत में जारी हिंसा और अलगाववादी गतिविधियों ने चीन के अरबों डॉलर के निवेश पर गंभीर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। चीन ने जिस चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC को अपने वैश्विक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI का आधार स्तंभ माना था, वही अब उसके लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बन चुका है। बलूचिस्तान महज पाकिस्तान का एक प्रांत नहीं है, बल्कि यह चीन की भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बिंदु है। अरब सागर तक पहुंच दिलाने वाला ग्वादर बंदरगाह और इस क्षेत्र में छिपे विशाल खनिज भंडार बीजिंग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, बिगड़ते हालात ने बीजिंग के इस सपने को एक खतरनाक दुष्चक्र में धकेल दिया है।

ग्वादर का सपना बना बीजिंग के लिए चिंता का विषय

चीन के लिए ग्वादर बंदरगाह उसकी समुद्री रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ था। ड्रैगन को उम्मीद थी कि इस बंदरगाह के माध्यम से उसे अरब सागर का सीधा दरवाजा मिल जाएगा, जिससे मध्य पूर्व से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के लिए एक वैकल्पिक और छोटा रास्ता तैयार हो सकेगा। इसी लक्ष्य के साथ चीन ने सड़कों, रेलवे नेटवर्क, ऊर्जा संयंत्रों और बंदरगाह बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर का निवेश किया। लेकिन धरातल पर स्थिति उम्मीदों के विपरीत रही है। ग्वादर आज एक वैश्विक व्यापारिक हब बनने के बजाय चीन की रणनीतिक उपस्थिति का एक प्रतीकात्मक ठिकाना बनकर रह गया है। यहां कमजोर परिवहन नेटवर्क, बेहद कम व्यापारिक आवाजाही, भारी भरकम लागत और सुरक्षा की निरंतर कमी ने इस पूरे सपने को एक आर्थिक बोझ में बदल दिया है।

CPEC पर हिंसा की सीधी मार

इस आर्थिक गलियारे की सफलता पूरी तरह से सुरक्षित सड़कों, राजनीतिक स्थिरता और स्थानीय लोगों के सहयोग पर टिकी थी। लेकिन बलूचिस्तान में सक्रिय अलगाववादी समूह लगातार चीनी परियोजनाओं और कर्मचारियों को अपने निशाने पर ले रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें चीनी नागरिकों की जान गई है। इसके चलते चीन का रुख अब आक्रामक होने के बजाय रक्षात्मक हो गया है। आज स्थिति यह है कि बीजिंग नए निवेश करने के बजाय अपनी पुरानी संपत्तियों और कर्मचारियों को बचाने के लिए अधिक चिंतित है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हिंसा का यह दौर इसी गति से चलता रहा, तो चीन को अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं, जहां उसका पूरा ध्यान केवल सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य तैनाती पर केंद्रित होकर रह जाएगा।

खनन परियोजनाओं पर भी मंडराता खतरा

चीन के लिए सबसे बड़ा झटका उसकी खनन परियोजनाओं को लग रहा है। बलूचिस्तान में चीन द्वारा संचालित सैंदक कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट ने पाकिस्तान सरकार को सख्त चेतावनी दी है। कंपनी का साफ कहना है कि यदि सुरक्षा हालात में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो वे काम बंद करने पर मजबूर होंगे। गौरतलब है कि यह पाकिस्तान की सबसे प्रमुख तांबा और सोना खदानों में से एक है। कंपनी के अनुसार, खराब कानून व्यवस्था के कारण उत्पादन सामग्री और आवश्यक उपकरणों की ढुलाई असंभव हो गई है। सड़क मार्ग बेहद खतरनाक हो चुके हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला टूट रही है। साथ ही, रेको डिक कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट जैसी करीब 9 अरब डॉलर की विशाल परियोजना भी इस सुरक्षा संकट के घेरे में है। यदि इन क्षेत्रों में स्थिरता नहीं लौटती है, तो विदेशी निवेशक अपना हाथ पीछे खींच सकते हैं, जिससे परियोजना की लागत कई गुना बढ़ सकती है।

हिंसा के पीछे का कड़वा सच

बलूचिस्तान में पनप रहा यह आक्रोश कोई नई बात नहीं है। लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन यहां का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय लोगों और संगठनों का सीधा आरोप है कि उनके प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर लाभ चीनी और अन्य बाहरी कंपनियां उठा रही हैं, जबकि स्थानीय जनता को इसका कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है। हाल के महीनों में इन हमलों में और तेजी देखी गई है। रेलवे लाइनों को निशाना बनाना, सुरक्षा बलों पर हमले और विदेशी निवेशों को तबाह करना पाकिस्तानी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। पाकिस्तानी सेना बार-बार सुरक्षा के पुख्ता दावे करती है, लेकिन जमीन पर स्थिति हर दिन बिगड़ती जा रही है।

क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और भारत की भूमिका

बलूचिस्तान की यह अस्थिरता भारत के लिए भी कई रणनीतिक संकेत लेकर आई है। सबसे पहले, यह CPEC की विफलता को उजागर करता है, जिसे चीन क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का मॉडल बताता था। दूसरा, पाकिस्तान अब अपनी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं में इतना उलझ गया है कि उसकी सैन्य और राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा यहीं खर्च हो रहा है। अंततः, अरब सागर क्षेत्र में भारत की स्थिति और मजबूत हो रही है। ग्वादर और बलूचिस्तान के अशांत रहने से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि चीन अपने निवेश को पूरी तरह खत्म नहीं करेगा, क्योंकि वे अपने रणनीतिक हितों के लिए पाकिस्तान में मौजूद रहना चाहते हैं। लेकिन, अब ड्रैगन को यह समझ आ गया है कि केवल धन और बड़ी परियोजनाओं के दम पर किसी क्षेत्र को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और स्थानीय लोगों का भरोसा ही विकास की वास्तविक चाबी हैं, जिसे बीजिंग फिलहाल बलूचिस्तान में हासिल करने में नाकाम साबित हो रहा है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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