पाकिस्तान सीमा सील होने से अफगान किसानों की कमर टूटी, अंगूर बेचने के बजाय किशमिश बनाने को मजबूर विश्व एक घंटा पहले 4
अफगानिस्तान के कंधार में इस साल अंगूर की बंपर पैदावार हुई है, लेकिन पाकिस्तान के साथ सीमा बंद होने के कारण किसान अपनी फसल बेचने के लिए तरस रहे हैं। निर्यात ठप होने से अंगूर और किशमिश दोनों के दाम में भारी गिरावट आई है, जिससे हजारों मजदूरों और बागवानों की रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया है।

कंधार में भरपूर फसल, पर बाजार तक नहीं पहुँच

अफगानिस्तान के दक्षिणी हिस्से में स्थित कंधार प्रांत में इस बार अंगूर के बाग लहलहा रहे हैं और उत्पादन काफी शानदार रहा है। लेकिन, यह खुशी किसानों के लिए चिंता में बदल गई है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की सीमा पर जारी तनाव और बॉर्डर बंद होने के कारण अंगूर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार अफगानिस्तान के उत्पादकों की पहुँच से दूर हो गया है। दोनों पड़ोसी देशों के बीच पिछले कई महीनों से पहाड़ी सीमा वाले इलाकों में रुक-रुककर गोलीबारी की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन हिंसक झड़पों में अब तक सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। पाकिस्तान का यह गंभीर आरोप है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार उन आतंकियों को संरक्षण दे रही है जो पाकिस्तानी क्षेत्र में आतंकी हमलों को अंजाम देते हैं, हालांकि काबुल इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है।

बाजार में अंगूर की भरमार और गिरती कीमतें

सीमा बंद होने का सीधा असर यह हुआ है कि अफगान किसानों का माल सीमाओं पर ही अटक गया है। कंधार के जरी जिले में अंगूर के गोदामों में किसान अपनी फसल को सुरक्षित रखने और उसे सुखाकर किशमिश में तब्दील करने की कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इन गोदामों में लगे पंखे गर्म हवाओं को प्रसारित कर रहे हैं, ताकि अंगूर किशमिश का रूप ले सकें। चूंकि ताजा अंगूरों को सीमा पार नहीं भेजा जा सका, इसलिए स्थानीय बाजार में उनकी खेप उतारनी पड़ी, लेकिन वहां पहले से ही आपूर्ति का अत्यधिक दबाव है। मांग कम और आपूर्ति अधिक होने से अंगूरों की कीमतें औंधे मुंह गिर गई हैं। मजबूरन किसानों को इन्हें सुखाकर किशमिश बनाना पड़ रहा है, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है क्योंकि किशमिश के दाम भी बेहद कम हो चुके हैं।

साखी जान की व्यथा: कमाई में भारी गिरावट

जरी जिले में अंगूर का बगीचा संभालने वाले साखी जान अपने परिवार के 10 सदस्यों का पेट पालने की जद्दोजहद में जुटे हैं। उन्होंने बताया कि आर्थिक हालात पहले जैसे नहीं रहे। साखी जान के अनुसार, कुछ समय पहले तक जो 7 किलो किशमिश 1000 से 1200 अफगानी मुद्रा में बिकती थी, आज उसी किशमिश के लिए बाजार में केवल 400 से 450 अफगानी मिल रहे हैं। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि संघर्ष के माहौल में काम मिलना दूभर हो गया है। पहले काम निरंतर चलता था और अंगूरों की बिक्री से घर का खर्च आसानी से निकल जाता था। उन्होंने सरकार और पाकिस्तानी प्रशासन से अपील की है कि वे रास्तों को खोलने के लिए किसी समझौते पर पहुंचें, क्योंकि इस व्यापारिक बाधा ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है।

अनार से अंगूर तक: निर्यात के आंकड़ों में आई गिरावट

कंधार चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इन्वेस्टमेंट के उप-निदेशक अब्दुल बाकी बीना ने निर्यात में आई भारी कमी की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इस संकट का दायरा अंगूर तक ही सीमित नहीं, बल्कि अनार जैसे अन्य फलों के व्यापार पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 में दक्षिणी अफगानिस्तान के 5 प्रमुख अंगूर उत्पादक प्रांतों ने कुल 44,225 टन अंगूर का निर्यात किया था, जिसका मूल्य करीब 13.8 मिलियन डॉलर आंका गया था। इसमें से 43,000 टन अंगूर अकेले पाकिस्तान भेजे गए थे, जबकि शेष हिस्सा बांग्लादेश, इराक और भारत की मंडियों में गया था। हालांकि, इस साल की स्थिति अत्यंत भयावह है। अभी तक महज 256 टन अंगूर का निर्यात हो सका है, जिसकी कुल कीमत केवल 1 लाख डॉलर रही है।

1500 मजदूरों का रोजगार छीना

सीमा बंदी के कारण बागवानों के साथ-साथ मजदूरों पर भी संकट का पहाड़ टूटा है। कुदरतुल्लाह पोपल नामक एक मजदूर, जो अंगूर तोड़ने का काम करता है, ने बताया कि जिस बगीचे में वह पिछले साल काम करते थे, वहां लगभग 1500 मजदूर रोजगार पा रहे थे। इस साल फसल अच्छी होने के बावजूद वह संख्या घटकर सिर्फ 15 रह गई है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि फसल की गुणवत्ता उत्तम है, लेकिन निर्यात न होने के कारण इसे केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रहना पड़ रहा है, जहां पहले से ही भारी तादाद में अंगूर मौजूद हैं। व्यापार ठप होने का खामियाजा बाग मालिकों से लेकर मजदूर वर्ग तक सभी को भुगतना पड़ रहा है।

गरीबी और कुपोषण के बीच बढ़ती मायूसी

अफगानिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक तंगी, गरीबी और कुपोषण की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में किसानों और छोटे व्यापारियों की आय में आई यह भारी गिरावट उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गई है। कंधार के किसान इस साल फसल की कमी से नहीं, बल्कि बाजार तक पहुँच की कमी से जूझ रहे हैं। पूरी मेहनत के बाद भी सही दाम न मिल पाना उन्हें कर्ज और बदहाली की ओर धकेल रहा है। किसान अब अपनी पूरी उम्मीदें किशमिश की बिक्री पर टिकाए हुए हैं, लेकिन वहां भी गिरते भाव उनकी चिंताओं को कम करने के बजाय और अधिक बढ़ा रहे हैं। (एपी के इनपुट के साथ)

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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