राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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सत्ता और विपक्ष के निशाने पर चुनाव आयोग
भारत में जब भी चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐतिहासिक और कड़े कदम उठाए हैं, तब-तब राजनीतिक दलों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से प्रतिक्रिया दी है। चुनाव आयोग की सक्रियता हमेशा से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विरोध का विषय रही है। टीएन शेषन ने जहां आयोग को नई मजबूती प्रदान की, वहीं केजे राव ने बिहार जैसे राज्यों में चुनाव की व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। अब मौजूदा दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी इसी तरह के बड़े बदलावों के चलते चर्चा के केंद्र में हैं और विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं।
विपक्ष का विरोध और ऐतिहासिक संदर्भ
वर्तमान समय में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष के बड़े विरोध का सामना कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने उन्हें पद से हटाने की मांग को लेकर अलग-अलग तरीके से आंदोलन तेज कर दिए हैं। दिल्ली में इन दलों द्वारा संयुक्त रूप से धरना-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
सोशल मीडिया और बदलता दौर
यह कोई पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग के खिलाफ आवाजें उठी हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल के दौरान भी उनके निर्णयों का जोरदार विरोध हुआ था। हालांकि, उस समय उनके इस्तीफे की मांग उस स्तर पर नहीं थी, क्योंकि तब आज जैसा सोशल मीडिया का दौर नहीं था। आज के समय में रील्स, मीम और डीप फेक कंटेंट ने सोशल मीडिया की पहुंच को कई गुना बढ़ा दिया है। साथ ही, AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने भी इस तरह के विरोध प्रदर्शनों में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव आयोग ने नियमों में क्रांतिकारी बदलाव किए, उन दलों ने हमेशा कड़ा विरोध किया जिन्हें लगा कि इन सुधारों से उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है। चाहे वह पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के साथ आयोग का टकराव हो या यूपीए सरकार के दौरान लालू यादव द्वारा उठाए गए सवाल, आयोग हमेशा से राजनीतिक दबावों के बीच ही काम करता आया है।
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