बुझे ज्वालामुखी के गड्ढे में बसा है 'देवताओं का मैदान', जहां दादा-पोते मिलकर खेलते हैं फुटबॉल, सरकार की एंट्री पर सख्त रोक विश्व एक महीने पहले 14
मैक्सिको सिटी के दक्षिण में एक बुझ चुके ज्वालामुखी के क्रेटर में बना 'फील्ड ऑफ द गॉड्स' फुटबॉल मैदान दुनिया भर में अपनी अनोखी पारिवारिक लीग के लिए मशहूर है, जहां हर रविवार 10 टीमें खेलती हैं और गांव वाले सरकारी मदद लेने से साफ इनकार कर देते हैं।

दुनिया भर में आलीशान फुटबॉल स्टेडियम बनाने पर अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं, जहां फीफा से जुड़े मुकाबलों के साथ-साथ क्लबों के बीच भी मैच होते हैं। लेकिन मैक्सिको का एक मामूली-सा मिट्टी का मैदान अपनी खासियत से पूरी दुनिया को हैरान कर रहा है। मैक्सिको सिटी के दक्षिण में एक बुझ चुके ज्वालामुखी के खोखले हिस्से के ठीक बीचों-बीच यह फुटबॉल मैदान बना हुआ है, जिसे 'फील्ड ऑफ द गॉड्स' यानी देवताओं का मैदान कहा जाता है।

हरी-भरी झाड़ियों और पहाड़ों से घिरा यह मैदान हर रविवार को रौनक से भर जाता है, जब यहां 'सांता सेसिलिया टेपेटलापा' कस्बे की एक स्थानीय लीग के मुकाबले खेले जाते हैं।

एक ही परिवार की टीमें, उम्र का कोई बंधन नहीं

इस मैदान पर टेओका एमेच्योर लीग खेली जाती है, जिसमें कुल 10 टीमें हिस्सा लेती हैं। इस लीग की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां खेलने वाली हर टीम इसी कस्बे के किसी एक परिवार के सदस्यों से बनी होती है।

मैच खेलने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं रखी गई है। यही वजह है कि यहां 15 साल के लड़के अपने ही परिवार के 65 साल के बुजुर्गों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गेंद के पीछे दौड़ते नजर आते हैं। यानी दादा और पोते सब एक साथ मैदान में उतरते हैं।

इस खेल में महिलाएं भले ही खुद मैदान पर नहीं उतरतीं, लेकिन हर रविवार वे भारी संख्या में बाउंड्री के बाहर खड़ी होकर अपनी पारिवारिक टीमों की हौसला-अफजाई करती हैं और खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाती हैं।

शौक नहीं, मजबूरी में बना यह मैदान

इस अनोखे मैदान के बनने की कहानी भी बेहद रोचक है। दरअसल, यह पूरा कस्बा बेहद संकरी और तीखी ढलान वाली खड़ी पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है, जहां खेल का मैदान बनाने के लिए कहीं समतल जमीन ही मौजूद नहीं थी। ऐसे में गांव वालों ने इस बुझे हुए ज्वालामुखी के गड्ढे की ओर रुख किया, क्योंकि उसके भीतर की सतह सबसे सीधी और समतल थी।

भले ही यह धूल और मिट्टी से भरा मैदान हो, लेकिन इसकी देखभाल पूरे गांव के लिए इज्जत का सवाल है। गांव के लोग बारी-बारी से इसकी सफाई और मरम्मत का जिम्मा खुद उठाते हैं। हर काम के लिए वे अपनी जेब से चंदा जुटाते हैं और सरकारी मदद लेने से साफ मना कर देते हैं।

सरकारी पैसे से इनकार के पीछे की दलील

सरकारी मदद न लेने के पीछे गांव वालों का अपना सख्त तर्क है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे इस मैदान की देखभाल अपनी ओर से सबसे बेहतर तरीके से करते हैं और उनकी लीग पूरी तरह अपने ही नियमों पर चलती है।

हम सरकार या नगर पालिका से कोई मदद इसलिए नहीं मांगते, क्योंकि अगर सरकार ने इस मैदान पर एक रुपया भी खर्च कर दिया, तो वे यहां अपना बोर्ड लगा देंगे और मालिकाना हक जताने लगेंगे। यह पहाड़ी और यह मैदान पूरे गांव की सामूहिक संपत्ति है, यह हमारी है और हम इसे खुद संभालेंगे। सरकार को दूर रखकर ही हम इस खेल के मैदान को अपने बच्चों के लिए बचा सकते हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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