भारत
एक दिन पहले
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विचारों
सफलता अक्सर उन लोगों के कदम चूमती है जो विपरीत परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय उनका डटकर सामना करना जानते हैं। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायी कहानी ओडिशा के एक सुदूर और पिछड़े इलाके से सामने आई है, जो देश के उन लाखों छात्र-छात्राओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरी है जो बेहद सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखते हैं। ओडिशा के कंधमाल जिले के एक अत्यंत पिछड़े गांव के एक अत्यंत गरीब परिवार ने वह कर दिखाया है जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। इस परिवार के चार सगे भाई-बहनों और उनकी एक चचेरी बहन ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक NEET परीक्षा उत्तीर्ण की है और वर्तमान में सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों से MBBS की पढ़ाई कर रहे हैं। इन पांचों बच्चों की अद्भुत सफलता ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है और सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक इस परिवार के संघर्ष की गूंज सुनाई दे रही है।
आर्थिक अभाव और संघर्षों से भरा पारिवारिक जीवन
यह कहानी ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 250 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित कंधमाल जिले के दरिंगबाड़ी ब्लॉक की है। यह क्षेत्र बेहद दुर्गम और आर्थिक रूप से पिछड़ा माना जाता है। इस परिवार के पास न तो पक्का मकान है और न ही आमदनी का कोई पक्का जरिया। एक जर्जर और टूटे-फूटे घर में रहने वाले इस परिवार की आजीविका केवल दिहाड़ी मजदूरी, पारंपरिक खेती और कभी-कभार पड़ोसियों या रिश्तेदारों से लिए गए उधार के पैसों पर टिकी हुई है। इस असाधारण परिवार के मुखिया 73 वर्षीय बुर्सी प्रधान और उनकी 62 वर्षीय पत्नी अनुसया प्रधान हैं। बुर्सी प्रधान ने अपने बच्चों का पेट भरने और उन्हें बेहतर भविष्य देने के लिए जीवन भर हाड़तोड़ मेहनत की है। उन्होंने कई सालों तक ओडिशा के बाहर केरल में भी एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया ताकि घर में दो वक्त की रोटी और बच्चों की किताबों का इंतजाम हो सके।
बुर्सी प्रधान और अनुसया प्रधान के कुल सात बच्चे हैं। इतने बड़े परिवार का खर्च केवल दिहाड़ी मजदूरी से चलाना किसी चुनौती से कम नहीं था। उनकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि यदि किसी दिन बुर्सी प्रधान को काम नहीं मिलता था, तो उस पूरे दिन की दिहाड़ी मारी जाती थी और घर का चूल्हा जलना भी मुश्किल हो जाता था। इस कड़े संघर्ष के बावजूद बुर्सी और उनकी पत्नी ने कभी भी बच्चों की पढ़ाई को बीच में रोकने का विचार नहीं किया। उम्र बढ़ने के साथ ही बुर्सी प्रधान का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, जिसके कारण उन्हें केरल से वापस अपने गांव लौटना पड़ा। वर्तमान में, यह परिवार बहुत ही सीमित कृषि आय, कभी-कभार की मजदूरी और पुराने कर्जों के सहारे ही अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है।
कैसे शुरू हुआ इन पांच बच्चों का डॉक्टर बनने का सफर?
इस परिवार में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखने की शुरुआत सबसे पहले बड़े बेटे बिभीषण प्रधान से हुई थी। उन्होंने साल 2021 में अपनी कड़ी मेहनत और लगन के बल पर पहली बार NEET परीक्षा पास की थी। इसके बाद से एक-एक करके कुल पांच बच्चे अब अलग-अलग सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अपनी सेवाएं देने की तैयारी कर रहे हैं, जिनकी सूची कुछ इस प्रकार है:
- बिभीषण प्रधान: इन्होंने साल 2021 में NEET परीक्षा पास की और कोरापुट के श्री लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लिया।
- मोनालिसा प्रधान: बिभीषण की बहन ने साल 2022 में परीक्षा पास की और अपने भाई वाले मेडिकल कॉलेज में ही दाखिला पाया।
- असरिया प्रधान: इन्हें भवानीपटना के शहीद रेंडो माझी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में MBBS सीट आवंटित हुई है।
- सुनेमी प्रधान: इनका चयन बलांगीर के भीम भोई मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के लिए हुआ है।
- मिनाक्षी प्रधान: बुर्सी प्रधान के छोटे भाई की बेटी (भतीजी) ने पुरी के श्री जगन्नाथ मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में सफलता हासिल की है।
मोनालिसा का संघर्ष और भाई-बहनों का मार्गदर्शन
इस परिवार में पहले सफल हुए बच्चों ने बाद में आने वाले भाई-बहनों के लिए एक तरह से मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। मोनालिसा की कहानी भी काफी संघर्षपूर्ण रही है। NEET परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने ब्रह्मपुर की एक कपड़े की दुकान में सेल्सगर्ल का काम किया था। उस काम के जरिए उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया, बल्कि बड़े भाई बिभीषण की मेडिकल की शिक्षा में भी वित्तीय मदद की। इसके बाद एक सहृदय डॉक्टर से मिली आर्थिक सहायता ने भी मोनालिसा की आगे की पढ़ाई जारी रखने में काफी मदद की।
यही प्रेरणा आगे के भाई-बहनों में भी देखने को मिली। असरिया ने बताया कि उनके बड़े भाई और बहन ने तैयारी के दौरान उनका काफी हौसला बढ़ाया। इस साल सफलता हासिल करने वाले असरिया और सुनेमी ने अपनी बारहवीं की पढ़ाई खत्म करने के बाद साथ मिलकर तैयारी की थी। दोनों ने ब्रह्मपुर में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और बिना किसी महंगी कोचिंग या बाहरी सहायता के, केवल स्व-अध्ययन के बल पर NEET की परीक्षा में यह बड़ी सफलता हासिल की है।
अपार गर्व के बीच आर्थिक बोझ की नई चिंता
एक मजदूर परिवार के लिए एक साथ पांच बच्चों का देश की शीर्ष मेडिकल पढ़ाई के लिए चुना जाना बेहद गर्व का विषय है, लेकिन इसके समानांतर ही एक बहुत बड़ी आर्थिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। एक भी बच्चे की मेडिकल की पढ़ाई का खर्च उठाना एक गरीब परिवार के लिए असंभव सा होता है, ऐसे में पांच बच्चों की फीस, किताबें और रहने का खर्च जुटाना माता-पिता के कंधों पर बहुत भारी पड़ रहा है।
बच्चों की 62 वर्षीय मां अनुसया प्रधान आज भी खेतों में दिहाड़ी मजदूरी का काम करती हैं। वह अपने बच्चों की तरक्की से बेहद खुश हैं, पर इस बात को लेकर हमेशा चिंतित रहती हैं कि आने वाले समय में पढ़ाई का भारी खर्च कैसे मैनेज होगा। इस साल बच्चों के एडमिशन और शुरुआती खर्चों के लिए परिवार को पहले ही भारी कर्ज उठाना पड़ गया है।
आदर्श का उदाहरण भी रहा है चर्चा में
आपको बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब किसी मजदूर के होनहार बच्चे ने इस तरह का कमाल किया हो। इससे पहले NEET 2026 की परीक्षा में 304वीं रैंक लाने वाले आदर्श की कहानी भी पूरे देश में बहुत लोकप्रिय हुई थी। आदर्श के पिता भी साधारण मजदूरी करते थे और उनके संघर्षों की कहानी सामने आने के बाद केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी आदर्श की लगन और मेहनत की खूब प्रशंसा की थी।
दशकों तक संघर्ष, दिहाड़ी मजदूरी और उधार के सहारे जिंदगी जीने वाले ओडिशा के कंधमाल के इस परिवार के सामने अब अपने पांच भावी डॉक्टरों की शिक्षा पूरी करवाने की एक बहुत बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद, इस परिवार ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो कठिन से कठिन परिस्थितियां भी आपके सपनों की राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं।
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