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6 दिन पहले
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Somvati Amavasya Katha 2026: जब अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस वर्ष यह पावन तिथि 15 जून को पड़ रही है। सनातन परंपरा में इस अमावस्या को अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और विधिपूर्वक पूजन करने से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और साधक पर ईश्वर की विशेष कृपा बरसती है। इस बार इस अमावस्या का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि यह अधिकमास में पड़ रही है। आइए, विस्तार से जानते हैं सोमवती अमावस्या से जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा।
सोमवती अमावस्या व्रत कथा
कथा के अनुसार किसी समय एक निर्धन ब्राह्मण परिवार रहता था, जिसमें पति-पत्नी और उनकी एक पुत्री थी। कन्या रूपवती होने के साथ-साथ संस्कारी और गुणी भी थी, किंतु परिवार की निर्धनता के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन उस ब्राह्मण के घर एक साधु महाराज पधारे। कन्या के सेवाभाव से प्रसन्न होकर साधु ने उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया, परंतु साथ ही यह भी बताया कि कन्या के हाथ में विवाह योग्य रेखा नहीं है।
यह सुनकर ब्राह्मण दंपति व्याकुल हो उठे और उन्होंने साधु महाराज से इसका कोई उपाय बताने की प्रार्थना की। साधु महाराज ने अपनी अंतर्दृष्टि से ध्यान कर बताया कि यहां से थोड़ी ही दूरी पर एक गांव है, जहां सोना नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने बेटे और बहू के साथ रहती है। यदि यह कन्या उस धोबिन की सेवा करे और बदले में वह स्त्री इसके विवाह के समय अपनी मांग का सिंदूर इस कन्या को लगा दे, और उसके बाद कन्या का विवाह संपन्न हो, तो इसके जीवन से वैधव्य योग अवश्य समाप्त हो जाएगा। यह सुनकर ब्राह्मणी ने अपनी पुत्री को धोबिन की सेवा करने के लिए भेजा। अगले दिन से ही कन्या प्रातःकाल उठकर सोना धोबिन के घर पहुंच जाती और साफ-सफाई समेत अन्य कार्य करने लगती।
यह सारी सेवा कन्या चुपचाप, बिना किसी को बताए करती रही। वह प्रतिदिन भोर में धोबिन के घर जाती, सारा कामकाज निपटाकर उनके जागने से पहले ही अपने घर लौट आती। एक दिन सोना धोबिन ने अपनी बहू से पूछा कि तुम इतनी सुबह उठकर सारे काम कब कर लेती हो कि मुझे भनक तक नहीं लगती। बहू ने उत्तर दिया कि मां, मैं तो यही समझ रही थी कि ये सब काम आप ही प्रतिदिन कर लेती हैं, क्योंकि मैं तो देर से उठती हूं। यह सुनकर सास-बहू दोनों हैरान रह गईं कि आखिर उनके घर का सारा काम कौन कर जाता है।
इसके बाद दोनों सास-बहू अपने घर पर निगरानी रखने लगीं। कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद धोबिन ने देखा कि अंधेरे में मुंह ढके एक कन्या उनके घर आती है और सारे काम निपटाकर लौट जाती है। जैसे ही कन्या जाने लगी, सोना धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी और पूछने लगी कि तुम कौन हो और इस तरह छिपकर मेरे घर की सेवा क्यों करती हो? तब कन्या ने उसे पूरी बात बता दी। सब कुछ जानकर सोना धोबिन उसे अपनी मांग का सिंदूर देने के लिए तैयार हो गई। उस समय धोबिन का पति कुछ अस्वस्थ था, फिर भी वह कन्या की सहायता करने के लिए चल पड़ी।
सोना धोबिन ने ज्यों ही अपनी मांग का सिंदूर कन्या की मांग में लगाया, त्यों ही उसके पति का देहांत हो गया। धोबिन को इस बात का आभास भी हो गया। उस दिन वह निर्जल ही घर से निकली थी, यह संकल्प लेकर कि रास्ते में जहां पीपल का वृक्ष मिलेगा, उसे भंवरी देकर और उसकी परिक्रमा करने के बाद ही जल ग्रहण करेगी। उस दिन सोमवती अमावस्या थी। कन्या के घर से मिले पूए-पकवान के स्थान पर उसने ईंट के टुकड़ों से 108 बार भंवरी दी और 108 बार पीपल वृक्ष की परिक्रमा करके तब जल ग्रहण किया। विधि-विधान से सोमवती अमावस्या का व्रत करने के प्रभाव से उसका पति पुनः जीवित हो उठा।
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