दिल्ली
6 घंटे पहले
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विचारों
गांधी परिवार की विशेष प्राथमिकता
कांग्रेस पार्टी में इन दिनों एक नया नाम चर्चा के केंद्र में है और वह है नेहा बोरा। जेएनयू की शोध छात्रा नेहा बोरा को गांधी परिवार का सीधा संरक्षण मिल रहा है। हाल ही में इंडिया ब्लॉक की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि गांधी परिवार उनके साथ पूरी तरह खड़ा है। राहुल गांधी न केवल नेहा बोरा को मीडिया के सामने बोलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, बल्कि वे पूरी प्रक्रिया में उन्हें प्राथमिकता देते नजर आए। यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है ताकि युवा मतदाताओं के बीच कांग्रेस की साख को फिर से मजबूत किया जा सके।
युवाओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश
जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के भीतर यह मंथन तेज हो गया है कि पार्टी युवाओं के बीच अपना जनाधार खो रही है। राहुल गांधी अपनी छवि को बदलने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। चाहे वह इंस्टाग्राम पर सक्रियता बढ़ाना हो, साधारण शर्ट पहनकर छात्रों के कार्यक्रमों में शामिल होना हो या फिर संगीत और प्रभावशाली युवाओं के साथ जुड़ना हो, कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हर वह कदम उठा रहा है जो उसे युवाओं के करीब ले जाए। हालांकि, अब तक पार्टी में एक ऐसे युवा और मुखर चेहरे की कमी थी जो छात्रों से सीधा जुड़ सके और उनमें नई ऊर्जा का संचार कर सके। अब यह कमी नेहा बोरा के माध्यम से पूरी करने का प्रयास किया जा रहा है।
कन्हैया कुमार से हो रही तुलना
नेहा बोरा के उभार के साथ ही राजनीतिक गलियारों में उनकी तुलना कन्हैया कुमार से की जाने लगी है। एक समय था जब जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार को कांग्रेस का भविष्य और युवाओं के बीच एक प्रभावी चेहरा माना गया था। राहुल गांधी ने उन्हें बड़ा मंच दिया, लेकिन चुनावी हार और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में उनके खराब प्रदर्शन के बाद वे पार्टी के भीतर हाशिए पर चले गए। अब नेहा बोरा की सक्रियता को देखकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या उनका राजनीतिक भविष्य भी कन्हैया कुमार की तरह ही सीमित होकर रह जाएगा, या वे वास्तव में कांग्रेस को मजबूती देंगी।
नेतृत्व की नई पसंद और पार्टी के भीतर विरोध
राहुल गांधी द्वारा आयोजित इंडिया ब्लॉक की चाय पार्टी में नेहा बोरा का मौजूद रहना और राहुल के बगल में बैठकर छात्रों की समस्याओं पर चर्चा करना यह संकेत देता है कि कांग्रेस का आलाकमान उन्हें बड़ी भूमिका के लिए तैयार कर रहा है। हालांकि, कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता इस बदलाव से खुश नहीं हैं। पार्टी का एक धड़ा नेहा बोरा के एआईएसए से पुराने जुड़ाव को लेकर सशंकित है। आलोचक इस संगठन को उग्रवादी विचारधारा वाला मानते हैं, जिससे वरिष्ठ नेताओं को डर है कि कहीं यह जुड़ाव भविष्य में पार्टी के लिए राजनीतिक बोझ न बन जाए।
रणनीति का गणित और भविष्य की चुनौतियां
कन्हैया कुमार का कांग्रेस में आगमन संदीप सिंह की मदद से हुआ था, जिन्होंने उन्हें प्रियंका गांधी वाड्रा के सामने पेश किया था। अब वही पैटर्न नेहा बोरा के मामले में भी अपनाया जा रहा है। गांधी परिवार और उनकी टीम ने सोशल मीडिया पर नेहा बोरा के प्रभाव और उनकी वाकपटुता को भांप लिया है। उन्हें लगता है कि वे न केवल दिल्ली, बल्कि उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी युवा वोट बैंक को पार्टी से जोड़ने में सहायक हो सकती हैं। उत्तराखंड की पृष्ठभूमि होने के कारण उनके पास राज्य के युवाओं तक पहुंचने का अवसर भी है।
राजनीतिक जोखिम और भाजपा का रुख
राजनीतिक अवसर के साथ-साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। नेहा बोरा ने उमर खालिद की रिहाई के पक्ष में मुखर होकर आवाज उठाई है। यदि वे कांग्रेस का मुख्य चेहरा बनती हैं, तो भारतीय जनता पार्टी निश्चित रूप से इस मुद्दे को तूल देगी। भाजपा आसानी से कांग्रेस पर यह आरोप लगा सकती है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानने वाले तत्वों के प्रति नरम रुख अपना रही है। यह वही रणनीति है जो भाजपा ने कन्हैया कुमार को घेरने के लिए अपनाई थी। ऐसे में नेहा बोरा के सामने अपनी वैचारिक पहचान को बरकरार रखते हुए मुख्यधारा की राजनीति में संतुलन बनाने की कठिन परीक्षा है। गांधी परिवार का भरोसा उन पर कायम है, लेकिन यह प्रयोग कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद होगा, यह समय ही बताएगा।
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