मुंगेर कांवड़ यात्रा: हाथों के बल चल रहे दिव्यांग मनोज और कंधे पर गणेश जी को बिठाकर ले जाते भक्त, आस्था के अनोखे दृश्य बिहार एक घंटा पहले 2
सावन के पावन महीने में मुंगेर के कच्ची कांवरिया पथ पर दो बेहद खास तस्वीरें सामने आई हैं, जहां एक दिव्यांग श्रद्धालु हाथों के बल बाबाधाम जा रहे हैं, तो वहीं शिवभक्तों का एक समूह गणेश जी की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर महादेव के दरबार पहुंच रहा है।

आस्था और संकल्प की अनूठी मिसाल

सावन का महीना पूरे देश में भक्ति के रंगों में रंगा हुआ है। इस दौरान देशभर से शिवभक्त बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर कूच कर रहे हैं। मुंगेर के कच्ची कांवरिया पथ पर इन दिनों कुछ ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जो न केवल श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं बल्कि लोगों के मन में अटूट विश्वास जगा रहे हैं। यहां आस्था की दो ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिन्होंने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पहली तस्वीर में पटना के नौबतपुर से आए एक दिव्यांग श्रद्धालु मनोज कुमार हैं, जो अपने हाथों के बल बाबा धाम की यात्रा पर निकले हैं। वहीं दूसरी तस्वीर में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए शिवभक्तों का एक जत्था भगवान गणेश की विशाल प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाकर महादेव के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहा है।

हाथों के सहारे बाबा की राह पर मनोज

पटना के नौबतपुर के रहने वाले मनोज कुमार के हौसले की जितनी सराहना की जाए, वह कम है। बचपन में मात्र तीन साल की उम्र में पोलियो के कारण अपने दोनों पैरों से दिव्यांग हो जाने के बावजूद उन्होंने अपनी हिम्मत कभी नहीं हारी। यह कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया है, बल्कि वे पिछले दो साल से लगातार इस तरह बाबा बैद्यनाथ धाम की यात्रा पूरी कर रहे हैं। वर्तमान में वे मुंगेर के कच्ची कांवरिया पथ पर अपने हाथों और घुटनों के सहारे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। रास्ते में जब अन्य कांवरिये उन्हें इस तरह कठिन तपस्या करते देखते हैं, तो वे खुद को रोक नहीं पाते और रुककर उनका उत्साह बढ़ाते हैं। मनोज के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक दर्शन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उनके अटूट आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है।

गणेश जी को पिता से मिलाने की जद्दोजहद

दूसरी तरफ, गाजीपुर से आए लगभग 40 से 45 शिवभक्तों की टोली ने अपनी यात्रा को बेहद भावुक मोड़ दिया है। ये भक्त अपने साथ भगवान गणेश की एक विशाल प्रतिमा लेकर निकले हैं। उन्होंने इस प्रतिमा को एक पालकी पर विराजित किया है और उसे पूरी मर्यादा के साथ कंधे पर उठा रखा है। इस भारी पालकी को ले जाने के लिए एक बार में 13 कांवरिये अपने कंधों पर भार उठाते हैं। जैसे ही उन्हें थोड़ी थकान महसूस होती है, उनके साथी तुरंत उनकी जगह ले लेते हैं ताकि यात्रा में कोई बाधा न आए। इन भक्तों का मानना है कि भगवान गणेश साक्षात महादेव के पुत्र हैं, इसलिए वे इस यात्रा के जरिए गणेश जी को उनके पिता यानी बाबा बैद्यनाथ से मिलाने की मनोकामना लेकर चल रहे हैं।

मुंगेर के पथ पर भक्ति के विविध रंग

कच्ची कांवरिया पथ पर जब यह जत्था भगवान गणेश की प्रतिमा के साथ आगे बढ़ता है, तो नज़ारा देखने लायक होता है। वहां मौजूद श्रद्धालु कुछ क्षण के लिए अपनी यात्रा रोककर इस अनोखे दृश्य को निहारने लगते हैं। मुंगेर की यह कांवड़ यात्रा अपनी विविधता और भक्ति के लिए जानी जा रही है। एक ओर मनोज कुमार हैं, जिन्होंने शारीरिक सीमाओं को पीछे छोड़कर अपनी मेहनत और लगन से बाबा के दरबार तक की राह चुन ली है, तो दूसरी ओर वे भक्त हैं जो अपने इष्ट को उनके पिता से मिलाने के लिए हर कष्ट सहने को तैयार हैं। ये दोनों ही उदाहरण श्रद्धा और समर्पण की एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं, जो आने वाले समय में भी भक्तों को प्रेरणा देती रहेगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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