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2 घंटे पहले
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गोरखपुर में वैशाली एक्सप्रेस का हाई वोल्टेज ड्रामा
भारतीय रेलवे में अक्सर देरी की खबरें आती रहती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जंक्शन पर जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया। नई दिल्ली से ललितग्राम जा रही वैशाली एक्सप्रेस के पहिए इसलिए थम गए क्योंकि ट्रेन के गार्ड के कोच में बैठने के लिए कुर्सी ही नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम के नायक 59 वर्षीय ट्रेन मैनेजर रामाशिश दास रहे, जिन्होंने नियमों और सुरक्षा के साथ समझौता करने से साफ इनकार कर दिया। मामला तब और गरमा गया जब सुरक्षा की मांग पर अड़े गार्ड ने ट्रेन को प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर ही खड़ा कर दिया। इस वजह से यात्रियों को न केवल भारी परेशानी का सामना करना पड़ा, बल्कि ट्रेन की रफ्तार भी काफी घंटों के लिए बाधित हो गई।
कुर्सी नहीं तो ट्रेन नहीं: क्या था पूरा मामला?
सोमवार की सुबह जब वैशाली एक्सप्रेस गोरखपुर पहुंची, तो वह पहले से ही 31 मिनट की देरी से चल रही थी। ट्रेन सुबह 9:48 बजे स्टेशन पर पहुंची थी। जब रामाशिश दास ने गार्ड कोच का कार्यभार संभाला, तो उन्होंने पाया कि वहां गार्ड के बैठने के लिए निर्धारित सीट ही नदारद थी। दास ने इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत स्टेशन अधिकारियों को इसकी सूचना दी और ट्रेन को आगे ले जाने से मना कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि लंबी दूरी की यात्रा और सुरक्षा मानकों के बीच वे किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठा सकते।
गार्ड का कड़ा रुख और रेलवे का सिस्टम
रिपोर्टों के अनुसार, दास से पहले जो गार्ड उस कोच में थे, वे किसी तरह पावर कार में बैठकर काम चलाकर निकल गए थे। लेकिन रामाशिश दास ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मौके पर ही कोच की तस्वीरें लीं, वाराणसी और सोनपुर रेल डिवीजन को इस बारे में सूचित किया और स्टेशन सुपरिटेंडेंट को आधिकारिक मेमो सौंप दिया। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि रास्ते में कोई तकनीकी समस्या आती है या आपातकालीन स्थिति पैदा होती है, तो उसका पूरा दोष उन पर मढ़ा जाएगा। इस तरह की असुरक्षित परिस्थितियों में ड्यूटी करना नियमों के खिलाफ है।
देवरिया में मिला प्लास्टिक की कुर्सी का समाधान
जब गोरखपुर में कुर्सी का इंतजाम नहीं हो सका, तो रेलवे अधिकारियों ने उन्हें देवरिया पहुंचने तक काम चलाने का सुझाव दिया। अंततः देवरिया पहुंचने पर उन्हें एक प्लास्टिक की कुर्सी दी गई, जिस पर बैठकर उन्होंने अपनी आगे की ड्यूटी जारी रखी। हालांकि, इस कुर्सी विवाद ने ट्रेन के समय-सारणी को बुरी तरह प्रभावित किया। ट्रेन गोरखपुर से कुल 1 घंटे 9 मिनट की देरी से रवाना हुई, जिसका असर आगे के स्टेशनों पर भी साफ दिखा:
- देवरिया सदर पहुंचने तक ट्रेन 82 मिनट लेट हो गई।
- सीवान में देरी 74 मिनट तक पहुंच गई।
- छपरा में ट्रेन 67 मिनट की देरी से पहुंची।
- सोनपुर में यह देरी 77 मिनट दर्ज की गई।
- मुजफ्फरपुर पहुंचने तक ट्रेन 78 मिनट तक लेट थी।
सुरक्षा और प्रोटोकॉल पर गार्ड का पुराना इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब रामाशिश दास ने सुरक्षा के मसलों पर प्रशासन को मुश्किल में डाला हो। वह अपने सख्त मिजाज के लिए जाने जाते हैं। कुछ साल पहले भी गोरखपुर में ही उन्होंने ट्रेन रोक दी थी क्योंकि उसमें अग्निशामक यानी फायर एक्सटिंग्विशर गायब थे। उनका मानना है कि 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेन में ड्यूटी करने वाले कर्मचारी की सुविधा और सुरक्षा से समझौता करना यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या 59 साल की उम्र में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर लंबी ड्यूटी करना एक सुरक्षित विकल्प है?
रेलवे प्रशासन का पक्ष
इस पूरे मामले पर पूर्वोत्तर रेलवे यानी NER के CPRO सुमित कुमार ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे को आधिकारिक रूप से ECR यानी पूर्व मध्य रेलवे के समक्ष उठाया गया है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि कोच के अंदर सीटों की उपलब्धता सुनिश्चित करना कैरिज एंड वैगन डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी है। हालांकि, इस विवाद ने यह साबित कर दिया कि जब बात अपने हक और सुरक्षा प्रोटोकॉल की हो, तो कर्मचारी किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। भले ही इसके लिए यात्रियों को एक घंटे से अधिक का समय प्लेटफॉर्म पर गंवाना पड़ा हो।
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