रक्षाबंधन पर दिव्य आभा से चमकता है मणिमहेश कैलाश, जानें भगवान शिव से जुड़ी यह अलौकिक गाथा धर्म एक घंटा पहले 4
हिमाचल प्रदेश में स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत अपनी धार्मिक भव्यता और अलौकिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। रक्षाबंधन से शुरू होने वाली यह यात्रा जन्माष्टमी और राधा अष्टमी के महत्वपूर्ण स्नान के साथ संपन्न होती है, जिसका आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है।

हिमाचल की वादियों में स्थित शिव का पावन धाम

हिमाचल प्रदेश की हसीन और आध्यात्मिक वादियों के बीच चंबा जिले में स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत एक ऐसा स्थान है, जो भक्तों की अटूट आस्था का केंद्र है। पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा यह पर्वत समुद्र तल से लगभग 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर यह पर्वत अपनी दिव्य रोशनी के लिए पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाता है। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने स्वयं माता पार्वती के लिए इस अद्भुत पर्वत का निर्माण किया था।

रक्षाबंधन और मणिमहेश यात्रा का संबंध

धार्मिक परंपराओं के अनुसार, रक्षाबंधन का त्योहार केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मणिमहेश यात्रा के आरंभ का भी सूचक है। इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। मान्यता है कि इसी दिन साधु-संतों का पहला जत्था मणिमहेश के लिए प्रस्थान करता है और वहां पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना करता है। रक्षाबंधन के पवित्र दिन से ही मणिमहेश यात्रा और मेले का आधिकारिक आगाज हो जाता है, जो आगे चलकर जन्माष्टमी और राधा अष्टमी तक चलता रहता है। जहाँ एक तरफ देश भर में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं, वहीं दूसरी तरफ शिव भक्त इस पर्वत की कठिन चढ़ाई कर भोलेनाथ के दर्शन करने निकल पड़ते हैं।

पर्वत से झलकती है मणि की दिव्य आभा

लोकमान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन की सुबह जब सूर्य की पहली किरणें मणिमहेश कैलाश की चोटी को स्पर्श करती हैं, तो एक अद्भुत और चमत्कारी दृश्य उत्पन्न होता है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि इस दौरान पर्वत से एक दिव्य प्रकाश की झलक दिखाई देती है, जिसे 'मणि' कहा जाता है। मणिमहेश झील का पानी बिल्कुल कांच की तरह साफ है, जिसमें बर्फ से ढके कैलाश पर्वत का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई दूसरी अलौकिक दुनिया साक्षात सामने आ गई हो।

जन्माष्टमी और राधा अष्टमी का महत्व

मणिमहेश यात्रा में दो प्रमुख तिथियां अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, जिनमें श्रद्धालु पवित्र झील में डुबकी लगाते हैं। पहली तिथि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी कृष्ण जन्माष्टमी है, जिसे 'छोटा स्नान' कहा जाता है। इसी दिन के साथ आधिकारिक यात्रा का पहला चरण पूरा होता है। भक्त कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना इस पवित्र झील में आस्था की डुबकी लगाते हैं। वहीं, यात्रा का समापन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी राधा अष्टमी को 'बड़ा स्नान' के साथ होता है। यह इस यात्रा का अंतिम और सबसे भव्य पड़ाव माना जाता है।

छड़ी यात्रा की परंपरा

मणिमहेश की यात्रा एक पारंपरिक 'छड़ी' के साथ शुरू होती है। यह छड़ी गूर चरपतनाथ जी की पवित्र छड़ी मानी जाती है, जिसे श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं। यह यात्रा चंबा शहर के प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर और दशनामी अखाड़े से आरंभ होकर मणिमहेश तक जाती है। इस दौरान पूरा माहौल भगवान शिव के भजनों और कीर्तनों से गूंज उठता है। जब यह यात्रा झील पर पहुंचती है, तो भरमौर के ब्राह्मण परिवार के राज पुरोहित रात भर अनुष्ठान और पूजा-पाठ संपन्न करते हैं। अगले दिन भक्त पवित्र स्नान (नौण) करते हैं और भगवान शिव की कृपा पाने के लिए झील की तीन परिक्रमा करते हैं।

गौरी कुंड और शिव कलोत्री का रहस्य

धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने गौरी कुंड में स्नान किया था, जबकि भगवान शिव ने शिव कलोत्री में स्नान किया था। इसी कारणवश, झील में अंतिम डुबकी लगाने से पूर्व महिला श्रद्धालु गौरी कुंड में और पुरुष श्रद्धालु शिव कलोत्री में स्नान करना आवश्यक मानते हैं। माना जाता है कि मणिमहेश में शिवशंकर स्वयं विराजमान हैं और उनके मस्तक पर स्थित 'मणि' भक्तों को आज भी अलौकिक अनुभव कराती है। शिव के पांच प्रमुख कैलाश स्थलों में से मणिमहेश को एक विशेष स्थान प्राप्त है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव आज भी शिवलिंग के रूप में मौजूद हैं और माता पार्वती को देवी गिरजा के स्वरूप में पूजा जाता है।

अदृश्य शिखर और चढ़ाई की चुनौतियां

भक्तों का यह भी मानना है कि मणिमहेश पर्वत का शिखर हमेशा बादलों और बर्फ की चादर से ढका रहता है, जो केवल उन्हीं को दिखाई देता है जिनकी श्रद्धा सच्ची और मन शुद्ध होता है। कई बार इसे अदृश्य शिखर भी कहा जाता है। इस पर्वत पर चढ़ाई करना नामुमकिन माना जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का दावा है कि यदि कोई भी व्यक्ति इस पर्वत को फतह करने की कोशिश करता है, तो उसे किसी अज्ञात अदृश्य शक्ति द्वारा रोक दिया जाता है। इसका एक उदाहरण वर्ष 1968 में देखने को मिला था, जब नंदिनी पटेल के नेतृत्व में इंडो-जापान की एक टीम ने पर्वत पर चढ़ाई करने का प्रयास किया था, लेकिन वे भी असफल रहे थे। आज भी मणिमहेश कैलाश पर्वत अपनी अनसुलझी गुत्थियों और शिव की दिव्यता के कारण लाखों लोगों के लिए श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप