सावन का दूसरा सोमवार: मधुबनी के उगना महादेव मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, जानिए भगवान शिव के सेवक बनने की अद्भुत कथा बिहार 2 घंटे पहले 4
सावन के दूसरे सोमवार पर मधुबनी स्थित उगना महादेव मंदिर में हजारों भक्तों ने जलाभिषेक किया, जहां मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं महाकवि विद्यापति की सेवा करने के लिए सेवक बनकर रहे थे।

भवानीपुर में शिव-भक्ति का महासंगम

सावन के दूसरे सोमवार, यानी 10 अगस्त को मिथिला क्षेत्र की आस्था का केंद्र माने जाने वाले भवानीपुर के उगना महादेव मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहा। सुबह चार बजे से ही महादेव के जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें देखी गईं। मिथिला की हृदय स्थली में स्थित इस पवित्र मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है, जिसे विद्यापतिधाम के नाम से भी जाना जाता है। सावन के पूरे महीने यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं। इस प्रसिद्ध मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्त कई किलोमीटर दूर से पैदल यात्रा करते हुए अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और कांवड़ यात्रा

इस पावन महीने में भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। कई श्रद्धालु कमला नदी या सिमरिया गंगा से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और महादेव को अर्पित करते हैं। मंदिर में भीड़ का आलम यह होता है कि उगना रेलवे स्टेशन से लेकर कई किलोमीटर लंबी कतारें लग जाती हैं। अपनी बारी आने के लिए भक्तों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। मंदिर परिसर के आसपास बने पंडालों में कांवड़ यात्रियों के विश्राम की व्यवस्था रहती है, जहां 'बोल बम' के जयकारों के साथ पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। बहुत से भक्त रविवार से ही यहां पहुंच जाते हैं और मंदिर परिसर के आसपास रात्रि विश्राम करके सोमवार सुबह विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। यहां चलने वाली मास परिक्रमा भी विशेष है, जिसमें भक्त पूरे सावन के महीने भर मंदिर के आसपास रुककर नित्य जलाभिषेक और साधना करते हैं। आज यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसे पर्यटन का दर्जा भी प्राप्त है, जहां लोग शुभ कार्यों और वैवाहिक कार्यक्रमों के लिए भी आते हैं।

महाकवि विद्यापति और भगवान शिव की अनूठी कथा

उगना महादेव मंदिर की प्रसिद्धि के पीछे 14वीं शताब्दी की एक अत्यंत रोचक और भावुक कथा जुड़ी है। यह कथा भगवान शिव और उनके अनन्य भक्त महाकवि विद्यापति के अटूट प्रेम को दर्शाती है। मान्यता है कि भगवान शिव अपने परम भक्त विद्यापति की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधारण सेवक के रूप में उनके घर रहने लगे थे। उन्होंने स्वयं का नाम 'उगना' रखा था। इस दौरान विद्यापति और उगना के बीच सेवक और स्वामी का रिश्ता नहीं, बल्कि एक गहरी मित्रता और भक्ति का बंधन था।

क्यों और कैसे अंतर्धान हुए महादेव?

उगना महादेव से जुड़ी कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। एक प्रसंग के अनुसार, एक बार जंगल के रास्ते यात्रा के दौरान विद्यापति को भयंकर प्यास लगी। तब उगना के रूप में साक्षात शिव ने अपनी जटा से गंगाजल निकालकर उन्हें पिलाया। जल का अलौकिक स्वाद चखते ही विद्यापति को यह अहसास हो गया कि उनके साथ कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं महादेव हैं। उन्होंने तुरंत शिव के चरण पकड़ लिए। तब भगवान शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप तो दिखाया, लेकिन एक शर्त भी रखी। उन्होंने कहा कि वे सेवक के रूप में तब तक ही रहेंगे, जब तक उनकी असल पहचान गुप्त रहेगी। यदि यह रहस्य उजागर हुआ, तो वे उसी क्षण वहां से चले जाएंगे।

हालांकि, एक दिन घर के कार्यों में देरी होने पर विद्यापति की पत्नी क्रोधित हो गईं और उन्होंने उगना को लकड़ी से मार दिया। यह दृश्य देखकर विद्यापति अपना धैर्य खो बैठे और बोल पड़े, तुम साक्षात भगवान शिव को मार रही हो। जैसे ही यह सत्य प्रकट हुआ, भगवान शिव वहां से तुरंत अंतर्धान हो गए। बाद में अपने भक्त की व्याकुलता और विरह को देखकर शिवजी ने उन्हें दर्शन दिए और सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि वे साकार रूप में तो वहां नहीं रह सकते, लेकिन उस स्थान पर शिवलिंग के रूप में हमेशा विराजमान रहेंगे। आज यही स्थान उगना महादेव के नाम से प्रसिद्ध है और उनकी उपस्थिति का प्रमाण बना हुआ है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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