बिहार
2 घंटे पहले
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मधुबनी जिले में एक-दो नहीं, बल्कि कई दर्जन ऐसे गांव हैं जहां बंदरों का उत्पात लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है। छत या आंगन में जैसे ही कुछ सूखने के लिए रखा जाता है, बंदर उसे खाने और बर्बाद करने पहुंच जाते हैं। ऐसे में अपने अनाज और भोजन की रक्षा करने के लिए ग्रामीणों ने एक देसी उपाय निकाला है, जो खासा कारगर साबित हो रहा है।
किन इलाकों में सबसे ज्यादा परेशानी
जिले के पंडौल प्रखंड के शाहपुर, सरहद, नवहटथ, जटेश्वर और लोहट जैसे गांवों के अलावा फुलपरास, झंझारपुर और बेनीपट्टी के कई इलाकों में बंदरों का आतंक बना रहता है। खास तौर पर नहर वाले क्षेत्र में बंदरों की संख्या काफी अधिक है। बाग-बगीचों में रहने के साथ-साथ ये बंदर खाने की तलाश में लोगों की छतों और आंगन तक पहुंच जाते हैं। आधा खाना और आधा बिखेर देना इन जीवों का स्वभाव बन गया है, जिससे ग्रामीणों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
क्या है ग्रामीणों का देसी नुस्खा
ग्रामीण चाहते थे कि बंदरों को ज्यादा चोट भी न पहुंचे और अनाज, फल तथा भोजन भी सुरक्षित रहे। इसी सोच के साथ उन्होंने एक कमाल का तरीका खोज निकाला है, जो है लकड़ी की गुलेटी और मिट्टी की गोली। जैसे ही छत पर गेहूं, दलहन या घरेलू सामान सुखाने के लिए रखा जाता है और बंदर नुकसान पहुंचाने पहुंचते हैं, ग्रामीण गुलेटी से निशाना लगाकर उन्हें खदेड़ देते हैं।
यह गोली मिट्टी की बनी होती है, जिसके लगते ही बंदर दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं। लोग पहले से मिट्टी के गोले बनाकर रख लेते हैं और लकड़ी की गुलेटी अब लगभग हर घर में मौजूद रहती है। बंदर दिखते ही दूर से निशाना साधा जाता है और वे देखते ही देखते कोसों दूर भाग जाते हैं। इस तरीके से बंदरों को ज्यादा चोट नहीं पहुंचती, लेकिन डर के मारे वे मैदान छोड़ देते हैं। कई बार तो किचन खुला रहने पर बंदर रोटियां और फल तक उठाकर भाग जाते हैं।
हर दिन की मजबूरी
परेशान ग्रामीणों के लिए अब यह जुगाड़ रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है। निशाना साधकर गोली दागते मदनमोहन झा बताते हैं कि यह हर दिन का काम है। बंदरों से बचने के लिए कई लोगों को ऐसा करना पड़ता है, क्योंकि अब उन्हें और कुछ कह पाना संभव नहीं रह गया है।
गांवों की ओर क्यों बढ़ रहे बंदर
स्थानीय लोगों के अनुसार बंदरों का यह आतंक साल 2012 के बाद से मधुबनी में कहीं ज्यादा देखने को मिल रहा है। जगह-जगह पुल और नहर के निर्माण कार्य तथा जंगलों के घटने के बाद से बंदर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर अधिक रुख करने लगे हैं।
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