चांद की मिट्टी लाएगा भारत और होगा अपना स्पेस स्टेशन, ISRO ने क्रायोजेनिक तकनीक से बदला भविष्य का गणित राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 2
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने क्रायोजेनिक इंजन तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल कर इतिहास रच दिया है। अब भारत का लक्ष्य 2035 तक अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाना और 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय यात्री को उतारना है।

तकनीकी आत्मनिर्भरता का नया अध्याय

जिस तकनीक को कभी भारत के लिए प्रतिबंधित किया गया था, जिस पर दुनिया की बड़ी महाशक्तियों ने दरवाजे बंद कर दिए थे, आज उसी क्षेत्र में भारत ने अपनी धाक जमा ली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि भारत ने अब क्रायोजेनिक इंजन तकनीक में पूर्ण महारत हासिल कर ली है। यह वही महत्वपूर्ण तकनीक है जिसे अतीत में भारत को देने से साफ मना कर दिया गया था। आज भारत ने न केवल उस कमी को पूरा किया है, बल्कि अपनी मेहनत से तीन अत्याधुनिक क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम विकसित कर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है। बेंगलुरु में आयोजित 17वें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कात्रे मेमोरियल लेक्चर के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे भारत ने टेक्नोलॉजी न मिलने की चुनौती को अपने तकनीकी नेतृत्व में बदल दिया है। उन्होंने उन देशों का आभार भी व्यक्त किया जिन्होंने उस समय तकनीक देने से मना किया था, क्योंकि उसी मनाही ने भारत को अपने दम पर खड़े होने और अपनी क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

भविष्य के महत्वाकांक्षी मिशन और रोडमैप

ISRO प्रमुख ने देश के आगामी अंतरिक्ष कार्यक्रमों का एक विस्तृत और साहसिक रोडमैप साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अब तेजी से भविष्य के मिशनों की ओर बढ़ रहा है, जिनमें मुख्य रूप से गगनयान और चंद्रयान शृंखला के आगामी चरण शामिल हैं। वी. नारायणन के अनुसार, भारत का दीर्घकालिक लक्ष्य 2035 तक अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना है। इसके साथ ही, 2040 तक भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का सपना है कि कोई भारतीय अंतरिक्ष यात्री अपने राष्ट्रीय ध्वज के साथ चंद्रमा की सतह पर कदम रखे। यह मिशन पूरी तरह से स्वदेशी लॉन्चर पर आधारित होगा।

गगनयान और चंद्रयान-4 की तैयारी

मानव-युक्त अंतरिक्ष मिशन यानी गगनयान के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में संगठन का मुख्य ध्यान पहले बिना चालक दल वाले मिशन पर है। इस साल इस महत्वपूर्ण मिशन पर काम चल रहा है। मिशन के परिणामों की बारीकी से समीक्षा करने और सुरक्षा मानकों को परखने के बाद ही इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने का अंतिम निर्णय लिया जाएगा। वहीं, चंद्रयान-4 मिशन पर काम युद्धस्तर पर जारी है, जो चंद्रमा से मिट्टी और कीमती नमूनों को पृथ्वी पर वापस लाने का भारत का पहला प्रयास होगा। इसके अलावा, जापान के साथ मिलकर विकसित किए जा रहे चंद्रयान-5 मिशन की योजना भी तैयार है। इस मिशन में 350 किलोग्राम वजनी रोवर भेजा जाएगा, जो लगभग 100 दिनों तक चंद्रमा की सतह पर काम करने में सक्षम होगा। यह चंद्रयान-3 के 25 किलोग्राम वाले रोवर और उसके 14 दिन के जीवनकाल की तुलना में एक बहुत बड़ी छलांग है।

सफलता का लंबा सफर और औद्योगिक सहयोग

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की यात्रा 1963 में शुरू हुई थी, जब सात किलोग्राम के एक छोटे साउंडिंग रॉकेट से शुरुआत की गई थी। आज भारत दुनिया के सबसे उन्नत लॉन्च व्हीकल बनाने वाले देशों में शुमार है। ISRO की इस सफलता में देश के औद्योगिक ढांचे का बड़ा योगदान रहा है। वी. नारायणन ने बताया कि अब तक ISRO ने 105 से अधिक लॉन्च व्हीकल मिशन और 135 से अधिक सैटेलाइट मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। इसके अलावा, भारत ने 34 देशों के 434 सैटेलाइट्स को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया है। इस विशाल नेटवर्क को चलाने में देश के लगभग 450 उद्योगों, 400 से अधिक स्टार्ट-अप्स और करीब 130 शैक्षणिक संस्थानों का अहम योगदान है। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय वायु सेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का जिक्र करते हुए कहा कि इनके सहयोग के बिना लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट प्रोग्राम की सफलता संभव नहीं थी।

तकनीकी सटीकता और सेमी-क्रायोजेनिक इंजन

अंतरिक्ष अभियानों में सटीकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ 100 में से 100 अंकों की सटीकता जरूरी है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए ISRO ने अपने 200-टन वाले सेमी-क्रायोजेनिक इंजन के विकास में एक बड़ा मील का पत्थर हासिल किया है। हाल ही में तमिलनाडु के महेंद्रगिरी स्थित इसरो प्रणोदन परिसर में 175 टन थ्रस्ट स्तर पर हॉट टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। वी. नारायणन ने बताया कि हम थ्रस्ट लेवल के करीब 90 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं और अब इंजन के अंतिम परीक्षणों की तैयारी की जा रही है। उन्होंने आश्वस्त किया कि सैटेलाइट पूरी तरह तैयार हैं और लॉन्च की तारीखों की घोषणा जल्द ही की जाएगी। पीएसएलवी (PSLV) कार्यक्रम से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा कि तकनीकी कारणों को समझ लिया गया है और वापसी की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने यह भी दोहराया कि गगनयान के लिए व्हीकल की ह्यूमन-रेटिंग और सभी सुरक्षा प्रणालियाँ पूरी तरह से विकसित कर ली गई हैं। अब बस अंतिम परीक्षणों और गैर-मानव मिशनों के सफल होने का इंतजार है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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