व्यापार
एक घंटा पहले
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विचारों
भारत दुनिया का सबसे बड़ा ज्वैलरी बाजार है, यह बात तो ज्यादातर लोग जानते हैं। लेकिन देश के भीतर सबसे बड़ा आभूषण बाजार कौन सा है, इसका जवाब बहुत कम लोगों को पता होता है। इसका नाम है जावेरी बाजार। दक्षिण मुंबई में भूलेश्वर और काल्बादेवी के बीच फैले इस बाजार में देश के 60 फीसदी से ज्यादा सोने-चांदी और हीरे का कारोबार होता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश की 60 फीसदी से अधिक गोल्ड ट्रेडिंग यहीं होती है।
हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा कारोबार आज भी पूरी तरह पर्ची और कोड के सहारे चलता है। डिजिटल भुगतान और यूपीआई के इस दौर में भी सैकड़ों साल पुरानी यह पर्ची आधारित कुरियर व्यवस्था बैंकिंग नेटवर्क के साथ-साथ चल रही है। सरकारी एजेंसियां इस पर कई बार छापेमारी कर चुकी हैं, फिर भी इसे रोक पाना मुश्किल साबित हो रहा है। जावेरी बाजार में आज भी इसी नेटवर्क को सबसे भरोसेमंद माना जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को आंगडिया सिस्टम कहा जाता है।
क्या है आंगडिया सिस्टम
भारत में सदियों पुरानी समानांतर बैंकिंग व्यवस्था को ही आंगडिया सिस्टम कहते हैं। इसका मकसद बड़ी मात्रा में नकदी, आभूषण और कीमती सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना होता है। यह व्यवस्था मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और मुंबई में लोकप्रिय है। आंगडिया दरअसल एक संदेशवाहक होता है, जो खुद ट्रेन, बस या अन्य साधनों से नकदी या पार्सल लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है।
यह पूरा तंत्र भरोसे पर टिका है और इसमें बहुत मामूली कमीशन लिया जाता है। मुंबई और सूरत के सोना और हीरा व्यापारी अपने कीमती सामान और कैश को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए आंगडिया का सहारा लेते हैं। खास बात यह है कि कारोबारी आंगडिया का चयन पीढ़ी दर पीढ़ी करते हैं, यानी जिस परिवार पर उनका भरोसा रहता है, उसी की अगली पीढ़ी को भी वे अपना आंगडिया बनाते हैं।
10 रुपये के नोट और कोड से होता है लेनदेन
आंगडिया सिस्टम काफी हद तक हवाला की तरह ही काम करता है। इसमें आंगडिया को 10 रुपये के नोट की सीरीज या कोड के साथ भेजा जाता है। इस तरह के लेनदेन में कोई लिखित अनुबंध नहीं होता और कोड के रूप में 'जोखिम' तथा 'झेवर' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी तकनीक का उपयोग नहीं होता।
कोई भी ऑर्डर देने से पहले खरीदार और विक्रेता 10 रुपये या 100 रुपये के नोट के सीरियल नंबर को अपना कोड बना लेते हैं। माल भेजने वाला यह कोड आंगडिया को सौंपता है और आंगडिया पार्सल पहुंचाते या लेते समय वही कोड खरीदार को बताता है। पार्सल केवल तभी हैंडओवर किया जाता है जब सीरियल नंबर आपस में मेल खाता है। कुछ मामलों में सीरियल नंबर की जगह फोन नंबर का भी इस्तेमाल होता है।
हवाला और आंगडिया में अंतर
पहली नजर में दोनों एक जैसे दिखते हैं, लेकिन इनमें बड़ा फर्क है। आंगडिया वाले पैसे, सोने या कीमती पत्थरों को भौतिक रूप में पहुंचाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई कुरियर कारोबार काम करता है। इस लिहाज से यह एक तरह से देश की वैध कुरियर व्यवस्था की तरह काम करता है और इस क्षेत्र की फर्मों का दावा है कि वे टैक्स का भुगतान करती हैं।
दूसरी ओर हवाला में पैसों का लेनदेन बिना किसी भौतिक आवाजाही के होता है। इस तरह का लेनदेन भारतीय और विदेशी कानून दोनों के तहत पूरी तरह गैरकानूनी माना जाता है।
कितनी होती है आंगडिया की कमाई
इस व्यवस्था की कामयाबी की एक बड़ी वजह इसकी कम लागत है। अनुमान के मुताबिक मुंबई के बाजार में करीब 200 आंगडिया सक्रिय हैं, जो अहमदाबाद, राजकोट, सूरत और बड़ौदा तक अपनी सेवाएं देते हैं। प्रति डिलीवरी इनकी फीस 100 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक होती है।
ये अपना पैकेज 24 घंटे के भीतर डिलीवर कर देते हैं, जबकि सामान्य कुरियर सेवा के लिए यह काम इतने कम समय में पूरा करना संभव नहीं होता। इसके अलावा इस व्यवस्था में किसी बीमा या दस्तावेज की भी जरूरत नहीं पड़ती।
अब क्यों पड़ रही जांच की जरूरत
इस वर्षों पुरानी व्यवस्था पर अब सरकार की नजर है। फरवरी 2026 में राजस्व खुफिया निदेशालय ने जावेरी बाजार में सोना पिघलाने वाली एक फैक्ट्री का पर्दाफाश किया था। इस दौरान 9.22 करोड़ रुपये कीमत का 5.8 किलोग्राम सोना भी जब्त किया गया था। आशंका जताई जा रही है कि यह सोना तस्करी के जरिये लाया गया था।
इससे पहले नवंबर 2025 में भी डीआरआई ने 15 करोड़ रुपये मूल्य का 11.88 किलोग्राम सोना जब्त किया था और इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था।
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