मध्य प्रदेश का अनोखा शिव मंदिर: 15 दिन तक पार्वती और नंदी से दूर रहते हैं भोलेनाथ, नहीं लगता बाहर का भोग मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 1
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में कार्तिक माह की एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भगवान शिव 15 दिन अकेले मालवा क्षेत्र के भ्रमण पर निकलते हैं और इस दौरान उन्हें बाहर का कोई भोग नहीं लगाया जाता।

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग अपनी एक अनूठी और रहस्यमयी परंपरा के लिए देशभर के श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आस्था, रहस्य और परंपरा का यह अद्भुत संगम आज भी हजारों भक्तों को अपनी ओर खींचता है।

बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान

खंडवा जिले में स्थित यह मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक प्रमुख स्थान रखता है। यहां हर वर्ष कार्तिक माह में एक विशेष धार्मिक आयोजन होता है। मान्यता के अनुसार इस दौरान भगवान भोलेनाथ स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मालवा क्षेत्र के भ्रमण पर निकलते हैं।

इस यात्रा की सबसे खास बात यह है कि भगवान इसमें अकेले जाते हैं। माता पार्वती और नंदी मूर्ति रूप में उनके साथ नहीं रहते। यही कारण है कि इस परंपरा को बेहद अनोखा और रहस्यमयी माना जाता है।

15 दिन तक नहीं लगता बाहर का भोग

इस 15 दिन की अवधि में भगवान को बाहर का कोई भी भोग अर्पित नहीं किया जाता। उनके साथ सवा मन सुकड़ी भेजी जाती है, जो घी, आटा और शक्कर से बना सूखा प्रसाद होता है, और पूरे भ्रमण के दौरान उसी से भोग लगाया जाता है। इस अवधि में मंदिर में दोपहर का भोग और शयन आरती भी बंद रहती है।

प्राचीन परंपरा का निर्वहन

धार्मिक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में जब श्रद्धालुओं के लिए ओंकारेश्वर तक पहुंचना कठिन था, तब भगवान स्वयं मालवा क्षेत्र में भ्रमण कर भक्तों को दर्शन दिया करते थे। उसी परंपरा का निर्वहन आज भी पूरी श्रद्धा के साथ किया जा रहा है।

यह विशेष परंपरा कार्तिक माह की गोपाष्टमी से आरंभ होती है और भैरव अष्टमी तक चलती है। जब भगवान भ्रमण से वापस लौटते हैं, तब भव्य उत्सव मनाया जाता है और उन्हें छप्पन भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद यह प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।

स्थूल रूप भ्रमण पर, सूक्ष्म रूप मंदिर में

मंदिर के पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित बताते हैं कि इन 15 दिनों में भगवान स्थूल रूप में मालवा भ्रमण पर रहते हैं, जबकि उनका सूक्ष्म रूप मंदिर में ही विराजमान रहता है। उनके अनुसार माता पार्वती और नंदी भी मंदिर में ही रहते हैं, इसी कारण यहां सीमित रूप में पूजा-अर्चना जारी रहती है।

एक मान्यता यह भी है कि भगवान रात्रि के समय ओंकारेश्वर में विश्राम करते हैं और उनके लिए मंदिर में चौसर, झूला और पालना सजाया जाता है। हालांकि भ्रमण काल के दौरान ये सभी परंपराएं अस्थायी रूप से बंद कर दी जाती हैं। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की यह परंपरा आस्था, रहस्य और परंपरा का ऐसा अद्भुत संगम है, जो आज भी हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!