कारगिल का किस्‍सा: क्या वाकई नवाज शरीफ को नहीं थी भनक, मुशर्रफ की साजिश के पीछे छिपे थे कौन से राज़ राष्ट्रीय राजनीति एक महीने पहले 77
कारगिल युद्ध की परतें खोलती इस विशेष सीरीज में जानिए कि किस तरह तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की शह पर जनरल परवेज मुशर्रफ ने ऑपरेशन बद्र को अंजाम दिया और कैसे यह युद्ध दोनों मुल्कों के इतिहास का काला अध्याय बना।

परवेज मुशर्रफ और नवाज शरीफ की जुगलबंदी का सच

कारगिल युद्ध को लेकर बरसों तक पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ यह दावा करते रहे कि उन्हें इस हमले की जानकारी ही नहीं थी। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय बैठकों तक यह साबित करने की कोशिश की कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने उनसे धोखे से यह ऑपरेशन कराया था। हालांकि, दस्तावेजों और उस दौर की घटनाओं के क्रम को देखें, तो सच बिल्कुल अलग नजर आता है। वास्तविकता यह है कि परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ द्वारा बनाई गई सीढ़ी पर चढ़कर ही ऑपरेशन बद्र की पटकथा लिखी थी। इस ऑपरेशन बद्र को बाद में दुनिया ने कारगिल युद्ध के रूप में जाना। यह महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि नवाज शरीफ की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और मुशर्रफ के रणनीतिक दुस्साहस का खतरनाक मिश्रण था।

जहांगीर करामत को हटाकर मुशर्रफ को चुना

नवाज शरीफ और परवेज मुशर्रफ की नजदीकियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शरीफ ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाने के लिए तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल जहांगीर करामत के साथ अपने संबंध पूरी तरह बिगाड़ लिए थे। जहांगीर करामत का कार्यकाल पूरा होने में अभी कुछ महीने बाकी थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान की सेना की कमान संभालें। नवाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से करामत की आलोचना करना शुरू कर दिया, जिससे आहत होकर करामत को समय से पहले ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह नवाज शरीफ की एक सोची-समझी चाल थी ताकि वे अपने मनमाफिक सेना प्रमुख को कुर्सी पर बिठा सकें।

दो वरिष्ठों को दरकिनार कर दी गई कुर्सी

जहांगीर करामत के जाते ही परवेज मुशर्रफ के लिए आर्मी चीफ बनने का रास्ता साफ हो गया। उस समय पाकिस्तान की सेना में वरिष्ठता के क्रम में मुशर्रफ तीसरे स्थान पर थे। बावजूद इसके, नवाज शरीफ ने अपने दो वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को नजरअंदाज करते हुए परवेज मुशर्रफ को पाकिस्तान का सेना प्रमुख नियुक्त कर दिया। इस नियुक्ति के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि शरीफ और मुशर्रफ के बीच कोई बड़ी डील हुई है, जिसका असर जल्द ही सीमा पर दिखने वाला था।

मुशर्रफ का एक्शन प्लान और नियुक्तियां

सेना प्रमुख का पद संभालते ही परवेज मुशर्रफ ने सेना के ढांचे में बड़ा बदलाव करना शुरू किया। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद को 10वीं कोर का कमांडर बनाया, जो पहले पाक अधिकृत कश्मीर में सेना का कामकाज देख रहे थे। इसके साथ ही, लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद आजिज खान को सेना का चीफ ऑफ स्टाफ बनाया गया। ये नियुक्तियां कोई सामान्य फेरबदल नहीं थीं, बल्कि ये आने वाले बड़े हमले की तैयारी का हिस्सा थीं। मुशर्रफ ने अपनी टीम तैयार कर ली थी और अब वे पूरी तरह से एक्शन मोड में थे।

ऑपरेशन बद्र की गुप्त शुरुआत

नवंबर 1998 में परवेज मुशर्रफ ने कारगिल में हमले की विस्तृत योजना पर काम करना शुरू किया। इस ऑपरेशन का मकसद जोजी ला दर्रे के पूर्वी हिस्से में नियंत्रण रेखा के समीकरणों को बदलना था। यदि वे इसमें सफल हो जाते, तो श्रीनगर-कारगिल-लेह राजमार्ग पर भारत की पकड़ ढीली हो जाती और जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए एक नया रास्ता मिल जाता। इस पूरे मिशन को ‘ऑपरेशन बद्र’ नाम दिया गया था। इस साजिश की गोपनीयता का स्तर इतना ऊंचा था कि पाकिस्तान के कुछ चुनिंदा सैन्य कमांडरों के अलावा किसी को भनक तक नहीं थी। नार्थ लाइट इन्फेंट्री की बटालियनों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया था और बॉर्डर तक रसद व हथियारों को पहुंचाने के लिए नए रास्ते तलाश लिए गए थे।

पेट्रोलिंग पोस्ट का जाल और फरवरी 1999 की हलचल

फरवरी 1999 आते-आते जमीन पर तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। पाक सेना ने पहले अपनी पेट्रोलिंग पार्टियों को सीमावर्ती इलाकों की टोह लेने भेजा और फिर वहां अवैध रूप से पेट्रोलिंग पोस्ट बनाना शुरू कर दिया। यह सब अप्रैल-मई 1999 में होने वाले बड़े हमले की जमीन तैयार करने के लिए किया जा रहा था। इस दौरान नवाज शरीफ यह दिखावा कर रहे थे कि वे भारत के साथ शांति वार्ता के पक्षधर हैं, जबकि पीछे से पूरा तंत्र युद्ध की आग सुलगा रहा था।

नवाज शरीफ को क्या सच में जानकारी नहीं थी

पाकिस्तान के अंदर ही कई बार यह सवाल उठा कि क्या सच में नवाज शरीफ अनजान थे? खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, दिसंबर 1998 या जनवरी 1999 में शरीफ को पहली बार कारगिल हमले की योजना के बारे में आधिकारिक रूप से जानकारी दी गई थी। इसके बाद मार्च 1999 में भी उन्हें दोबारा इस बाबत ब्रीफिंग दी गई थी। परवेज मुशर्रफ और आजिज खान की गुप्त बातचीत के टेप्स भी इस ओर इशारा करते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस पूरी साजिश से अनभिज्ञ नहीं था।

भारत के खिलाफ जहर और कूटनीतिक चालें

लाहौर घोषणापत्र पर दस्तखत करने के बाद भी अप्रैल 1999 में नवाज शरीफ के सुर बदल गए। जब भारत ने अग्नि-2 मिसाइल का परीक्षण किया, तो पाकिस्तान ने इसे मुद्दा बनाकर भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के झूठे आरोप लगाने शुरू कर दिए। नवाज शरीफ ने अपनी हताशा दिखाने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नासिर को पाकिस्तानी गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का प्रमुख बनाया और 13 अप्रैल 1999 को सिख अलगाववादियों से मुलाकात की। उनका मकसद यह दर्शाना था कि पाकिस्तान भारत के पंजाब में फिर से आतंकवाद भड़का सकता है।

मुशर्रफ को विशेष शक्तियां और अंतिम तैयारी

युद्ध से कुछ महीने पहले नवाज शरीफ ने परवेज मुशर्रफ को जॉइंट चीफ कमेटी का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाकर उन्हें व्यापक शक्तियां दे दी थीं। इसके बाद मुशर्रफ के पास स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांडर की तैनाती का अधिकार आ गया। इसी दौरान युद्ध के बीच नवाज शरीफ ने चीन और अमेरिका की यात्राएं कीं ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात के दौरान शरीफ ने यह तक कह दिया था कि अगर युद्ध तुरंत न रुका तो उनके देश में उनकी जान खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि, यह सब केवल अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बटोरने के तरीके थे। सच्चाई तो यह थी कि नवाज शरीफ लाहौर घोषणापत्र पर दस्तखत करने से पहले ही इस बात से वाकिफ थे कि सेना नियंत्रण रेखा के उस पार जाने की तैयारी में है। कारगिल युद्ध के बाद खुद मुशर्रफ के साथ उत्तरी इलाकों में जाकर नवाज शरीफ ने सैनिकों के परिवारों से मुलाकात की थी, जो इस बात का बड़ा सबूत है कि वे इस पूरी साजिश में बराबर के भागीदार थे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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