नौ माह में बाजार के लिए तैयार, साल में दो बार बच्चे; करौली नस्ल की बकरी बना रही राजस्थान के पशुपालकों को मालामाल राजस्थान एक घंटा पहले 1
पूर्वी राजस्थान की करौली बकरी दूध और मांस दोनों देने वाली ड्यूल पर्पज नस्ल है, जो कम लागत और अधिक मुनाफे के कारण पशुपालकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

पूर्वी राजस्थान की पहचान बनी करौली नस्ल

पूर्वी राजस्थान की मशहूर करौली बकरी इन दिनों पशुपालन के लिए लगातार चर्चा में है और इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। यह नस्ल पशुपालकों के बीच एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में अपनी जगह बना रही है।

दूध और मांस दोनों में फायदेमंद

करौली एक ड्यूल पर्पज नस्ल है, यानी इससे दूध और मांस दोनों का बेहतर उत्पादन हासिल होता है। इसकी वृद्धि दर तेज होने के कारण नर बच्चे लगभग 9 महीने में ही बाजार के लायक हो जाते हैं। वहीं मादा बकरियां प्रतिदिन 1.5 से 2 लीटर तक दूध देने में सक्षम मानी जाती हैं।

कम लागत, अधिक मुनाफा

अच्छी प्रजनन क्षमता, कम रखरखाव खर्च और बीमारियों के प्रति बेहतर सहनशीलता इस नस्ल को पशुपालकों के लिए खासा लाभकारी बनाती है। यही कारण है कि करौली बकरी कम निवेश में ज्यादा मुनाफा देने वाली नस्ल के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रही है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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