राजस्थान
15 घंटे पहले
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विचारों
कई बार इंसान और बेजुबान के बीच ऐसा नाता जुड़ जाता है, जो खून के रिश्तों से भी ज्यादा गहरा महसूस होने लगता है। हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि कोई घायल या असहाय वन्यजीव किसी के आंगन तक पहुंच जाता है और वहां उसे महज पनाह ही नहीं, बल्कि परिवार जैसी ममता भी मिल जाती है। इसी तरह का एक दिल छू लेने वाला वाकया जोधपुर के केरू क्षेत्र के इस्लामनगर गांव से सामने आया है, जहां एक परिवार ने हिरण के एक नन्हे बच्चे को पूरे तीन महीने तक अपनी बेटी की तरह पाला।
इस दौरान परिवार ने न केवल उसकी देखरेख की, बल्कि उसे घर के सदस्य की तरह स्नेह और अपनापन भी दिया। मां का साथ न होने की वजह से उसे खास देखभाल की दरकार थी, जिसे परिवार ने पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाया। वक्त के साथ वह नन्ही हिरणी परिवार से इस कदर घुल-मिल गई कि घर का हिस्सा बन गई। मगर जब उसे वन विभाग को सौंपने की घड़ी आई, तो पूरा परिवार भावुक हो उठा और विदाई का दृश्य देखकर हर किसी की आंखें भर आईं।
कुत्तों के हमले से बचाकर घर लाया नन्हा मेहमान
इस्लामनगर के रहने वाले इलियास खान के लिए मार्च का वह दिन आज भी यादगार है, जब उन्होंने गांव के पास कुत्तों के झुंड से घिरी एक डरी-सहमी हिरणी को देखा। हमले से बचने की कोशिश में वह इधर-उधर भाग रही थी। मानवता के भाव से प्रेरित होकर इलियास उसे अपने घर ले आए। उस वक्त वह बेहद घबराई हुई थी और किसी के पास आने से भी डरती थी। परिवार ने उसे सुरक्षित माहौल दिया और धीरे-धीरे वह घर के वातावरण में रचने-बसने लगी।
बेटी जैसा मिला प्यार, नाम रखा 'फातिमा'
इलियास की पत्नी और बच्चों ने हिरणी की देखभाल ठीक उसी स्नेह से की, जैसे घर के किसी छोटे सदस्य की जाती है। मां का साया न होने के कारण उसे घर में पाली जा रही बकरी का दूध पिलाया गया। धीरे-धीरे वह परिवार का अभिन्न अंग बन गई। बच्चों के साथ खेलना, आंगन में दौड़ना और परिवार के लोगों के पीछे-पीछे घूमना उसकी आदत में शामिल हो गया। परिवार ने प्यार से उसका नाम 'फातिमा' रखा। जैसे ही कोई उसे नाम लेकर पुकारता, वह दौड़कर सामने आ जाती। तीन महीने में वह एक मेहमान नहीं, बल्कि परिवार की बेटी बन चुकी थी।
बिछड़ने की खबर ने किया भावुक
समय के साथ जब फातिमा बड़ी होने लगी, तो इलियास ने उसकी सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसकी जानकारी पूर्व पंचायत समिति सदस्य ओमदान चारण को दी। इसके बाद वन विभाग की टीम रविवार को गांव पहुंची। जैसे ही परिवार को पता चला कि अब फातिमा को वन विभाग अपने साथ ले जाएगा, घर का माहौल भावुक हो गया। बच्चों की आंखों में आंसू थे और परिवार के सदस्य उसे बार-बार दुलारकर अपने प्यार का अहसास करा रहे थे।
मेहंदी लगाकर भावुक विदाई
फातिमा की विदाई का दृश्य हर किसी को भावुक कर देने वाला था। परिवार ने उसे बेटी की तरह सजाया। उसके पैरों, कमर और सिर के हिस्से पर मेहंदी लगाई गई। घरवालों ने उसके सिर पर हाथ फेरकर दुलार किया और आखिरी बार उसी बकरी का दूध पिलाया, जिसके सहारे वह तीन महीने तक पली-बढ़ी थी। जब वन विभाग की टीम उसे लेकर रवाना हुई, तो घर के कई सदस्य अपनी भावनाएं नहीं रोक पाए। नम आंखों और भारी मन से परिवार ने फातिमा को विदा किया, लेकिन उसके साथ बिताए तीन महीने हमेशा उनकी यादों में जिंदा रहेंगे।
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