जितिया व्रत 2026: मारुआ, नूनी साग और मछली का क्या है महत्व? जानिए कठिन उपवास के नियम और शुभ मुहूर्त धर्म एक घंटा पहले 4
बिहार और मिथिलांचल में आस्था का महापर्व जितिया संतान और पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। इस कठिन निर्जला व्रत से जुड़ी परंपराओं, खान-पान और विधियों की विस्तृत जानकारी यहाँ दी गई है।

जितिया व्रत की अनूठी परंपरा

बिहार के सबसे कठिन और श्रद्धापूर्ण उपवासों में से एक जितिया व्रत है। इसे विशेष रूप से संतान और पति की दीर्घायु और खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस व्रत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें शुद्धता के सामान्य मानदंडों के विपरीत कुछ खास चीजों को ग्रहण करने की परंपरा है। मारुआ की रोटी, नूनी का साग और मछली का सेवन इस व्रत के शुरू होने से पहले अनिवार्य माना जाता है, जो इसे अन्य हिंदू व्रतों से बिल्कुल अलग बनाता है।

व्रत की शुरुआत और खजितिया का महत्व

साल 2026 में जितिया व्रत को लेकर विशेष चर्चा है। इस बार व्रत की शुरुआत खजितिया के योग से हो सकती है। मान्यताओं के अनुसार, यदि व्रत का दिन शनिवार या मंगलवार को पड़ता है, तो उसे खजितिया कहा जाता है। ऐसे में जो महिलाएं पहली बार इस व्रत को शुरू करना चाहती हैं, उनके लिए यह समय बेहद शुभ माना जाता है। पुत्र प्राप्ति के बाद से ही महिलाएं इस व्रत को धारण करने की शुरुआत करती हैं।

खान-पान की खास परंपरा

मिथिलांचल के क्षेत्रों में प्रचलित इस व्रत में खान-पान की विधि काफी दिलचस्प है। जहां अन्य पर्वों में पूरी तरह सात्विक भोजन की प्रधानता होती है, वहीं जितिया व्रत से पहले महिलाएं मारुआ के आटे से बनी रोटी का सेवन करती हैं। इसके साथ ही नूनी साग और मछली का भोजन भी किया जाता है। जो महिलाएं मांसाहार का सेवन नहीं करती हैं, वे मारुआ रोटी के साथ नूनी साग और दही-चूड़ा खाकर इस व्रत की प्रक्रिया पूरी करती हैं।

निमंत्रण और पूर्वजों को याद करने की विधि

सुधा देवी के अनुसार, इस व्रत में महिलाओं को निमंत्रण देकर अपने घर बुलाने की परंपरा है। जितिया के अवसर पर घर में महिलाओं को विशेष भोज कराया जाता है, जिसमें मछली, चावल, सब्जी और दही परोसा जाता है। यह भोज उन पूर्वज महिलाओं के नाम पर किया जाता है जो अब इस संसार में नहीं हैं। इस आयोजन का उद्देश्य अपने परिवार की सुख-शांति और संतान की रक्षा के लिए आशीर्वाद प्राप्त करना होता है।

निर्जला उपवास और ओठगन की प्रक्रिया

जितिया का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है क्योंकि इसमें महिलाओं को पूरे समय निर्जला रहना पड़ता है। व्रत के नियमों के तहत, उपवास शुरू होने से एक दिन पहले सुबह जल्दी उठकर 'ओठगन' की रस्म निभाई जाती है। इस रस्म में घर के बच्चों को दही और चूड़ा खिलाया जाता है। व्रत के अगले दिन पूजा के दौरान तेल, खर और सुपारी जैसी सामग्री अर्पित की जाती है, जिसे बाद में संतानों को लगाया जाता है। यह व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि अपनी परंपराओं और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक माध्यम भी है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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