बेरोजगारी को दी मात, अब मधुमक्खी पालन से हर महीने लाखों की कमाई कर रहे हैं जहानाबाद के संतोष बिहार एक महीने पहले 68
ग्रेजुएशन के बाद नौकरी की तलाश में जूझ रहे जहानाबाद के संतोष कुमार केसरी ने आज मधुमक्खी पालन को अपना मुख्य व्यवसाय बनाकर मिसाल कायम की है। सरकारी सब्सिडी और मेहनत के दम पर उन्होंने 10 बक्सों से शुरू करके आज 400 बक्सों तक का सफर तय किया है।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

बिहार के जहानाबाद जिले में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय तेजी से फल-फूल रहा है, जहाँ स्थानीय लोग इसे एक बेहतर आजीविका के रूप में चुन रहे हैं। सरकार भी इस दिशा में नई योजनाओं के जरिए युवाओं को प्रोत्साहित कर रही है। इसी क्रम में काको प्रखंड के नदियांवा गांव के रहने वाले संतोष कुमार केसरी की कहानी आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब संतोष को कोई उपयुक्त रोजगार नहीं मिल सका, तो उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमाने का फैसला किया।

ट्रेनिंग और शुरुआत

अपनी बेरोजगारी के दिनों में संतोष इधर-उधर छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन चला रहे थे। इसी बीच एक परिचित व्यक्ति ने उन्हें मधुमक्खी पालन की सलाह दी। इस सुझाव पर अमल करते हुए उन्होंने गंधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जाकर बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, वर्ष 2019 में उन्होंने मात्र 10 बक्सों से मधुमक्खी पालन की शुरुआत की। उस समय उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी यह छोटी सी शुरुआत आगे चलकर बड़े व्यवसाय का रूप ले लेगी। आज वे अपनी कड़ी मेहनत और सूझबूझ से अपने व्यवसाय को 400 बक्सों तक पहुंचाने में सफल रहे हैं।

सरकारी सहायता और आधुनिक तकनीक

संतोष के इस सफर में आत्मा जहानाबाद की भूमिका महत्वपूर्ण रही। संस्था की मदद से उन्हें 50 मधुमक्खी के बक्से उपलब्ध कराए गए, जिससे उनके काम को नई गति मिली। उन्होंने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज अपनी लगन के दम पर वे हर महीने लगभग 40,000 रुपए तक की कमाई कर लेते हैं। वर्तमान में जहानाबाद जिले के करीब 200 परिवार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हुए, बाजार में 4,000 रुपए की कीमत वाला बक्सा किसानों को 70 प्रतिशत सब्सिडी के बाद महज 1,200 रुपए में उपलब्ध हो रहा है।

उत्पादन और कमाई का गणित

मधुमक्खी पालन के व्यवसाय में उत्पादन की काफी संभावनाएं हैं। यदि परिस्थितियां अनुकूल रहें, तो एक बक्से से साल भर में लगभग 60 किलो शहद का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इस हिसाब से संतोष के पास मौजूद 400 बक्सों से सालाना 240 क्विंटल तक शहद का उत्पादन संभव है। हालांकि, शहद की बाजार कीमतें स्थिर नहीं रहतीं। संतोष के अनुसार, बाजार में शहद की खुदरा बिक्री 500 रुपए प्रति किलो तक हो जाती है, जबकि थोक व्यापारी इसे 300 रुपए और अन्य व्यापारी करीब 150 रुपए प्रति किलो के भाव से खरीदते हैं।

बाजार और भंडारण की चुनौतियां

अपनी सफलता के बावजूद, संतोष का मानना है कि इस क्षेत्र में अभी भी सुधार की काफी गुंजाइश है। उन्होंने बताया कि प्रखंड स्तर पर शहद का बड़े पैमाने पर उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन उचित भंडारण और बेहतर बाजार व्यवस्था की कमी के कारण उत्पादकों को अपना माल जल्दबाजी में बेचना पड़ता है। यदि शहद के भंडारण के लिए सही कोल्ड स्टोरेज या वेयरहाउसिंग की सुविधा मिल जाए, तो उत्पादक उसे सही समय आने पर बेच सकते हैं। इससे उन्हें बेहतर मुनाफा मिल सकेगा और उनकी आर्थिक स्थिति और भी मजबूत हो सकेगी। संतोष की यह कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक उदाहरण है जो संसाधनों की कमी या बेरोजगारी के कारण हताश हो जाते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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