जहानाबाद का वह मशहूर सिनेमा हॉल, जहां अब फिल्मों की जगह होती है पढ़ाई बिहार एक महीने पहले 73
डिजिटलीकरण के इस दौर में जहानाबाद का एक पुराना सिनेमा हॉल अब अपनी पहचान बदल चुका है, जहां कभी मनोरंजन के लिए लंबी कतारें लगती थीं, वहां अब विद्यार्थियों की भीड़ जुटती है।

बदलता हुआ मनोरंजन का दौर

आज के आधुनिक युग में जीवन जीने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। तकनीक ने हर काम को बेहद आसान बना दिया है, जिससे लोग अब घर बैठे ही दुनिया भर की सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। एक समय था जब मनोरंजन, खेलकूद या फिर शिक्षा के लिए भी घर से बाहर निकलना अनिवार्य होता था, लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल अलग है। मनोरंजन के क्षेत्र में आए बदलावों ने तो सिनेमा देखने के पुराने तौर-तरीकों को ही इतिहास बना दिया है। पहले नई फिल्म के रिलीज होने पर दर्शकों को शुक्रवार का बेसब्री से इंतजार रहता था, जिसके बाद सिनेमा हॉल के बाहर घंटों लाइन में लगकर टिकट खरीदना पड़ता था।

घर बैठे मनोरंजन और सिनेमा हॉल का संकट

डिजिटलीकरण के प्रभाव ने आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को हर व्यक्ति के स्मार्टफोन और टेलीविजन तक पहुंचा दिया है। अब घर बैठे ही नई फिल्में देखना और मल्टीप्लेक्स के टिकट ऑनलाइन बुक करना बेहद सामान्य हो गया है। प्रोजेक्टर और स्मार्ट टीवी की मौजूदगी ने घर को ही मिनी थिएटर का रूप दे दिया है। इस आधुनिक बदलाव का सबसे बुरा असर पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों पर पड़ा है। देश के अधिकांश पुराने सिनेमा हॉल या तो पूरी तरह से बंद हो चुके हैं या फिर अपनी चमक खोकर खस्ताहाल स्थिति में पहुंच गए हैं।

जहानाबाद के शिव शंकर सिनेमा हॉल की कहानी

बिहार के जहानाबाद जिले में भी मनोरंजन की दुनिया का एक ऐसा ही केंद्र था, जो अब अपनी पुरानी भूमिका से पूरी तरह बदल चुका है। शहर के ऊंटा मोड़ के पास स्थित 'शिव शंकर सिनेमा हॉल' का इतिहास लगभग 35 साल पुराना है। कभी यह स्थान शहर के लोगों के लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। हर शुक्रवार को यहाँ नए शो के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती थी और टिकट खिड़की पर लंबी कतारें देखी जा सकती थीं। स्थानीय लोगों के अनुसार, उस दौर में यह हॉल पूरे शहर में अपनी धाक जमाए हुए था।

कभी थी कड़ी प्रतिस्पर्धा

जानकारी के मुताबिक, यह हॉल उस समय जहानाबाद का सबसे लोकप्रिय और बेहतरीन सिनेमाघर माना जाता था। इसकी कड़ी प्रतिस्पर्धा शहर के अंबेडकर चौक पर स्थित 'तिलोत्तमा सिनेमा हॉल' से हुआ करती थी। इस सिनेमा हॉल की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नई फिल्मों का आनंद लेने के लिए आस-पास के क्षेत्रों से लोग 30 किमी दूर का सफर तय करके यहां पहुंचते थे। स्थानीय निवासियों के अनुसार, प्रभात सिनेमा के बाद 'शिव शंकर चित्र मंदिर' का ही जलवा था, जिसने धीरे-धीरे प्रभात सिनेमा को भी पीछे छोड़ दिया था।

सिनेमा से शिक्षण केंद्र तक का सफर

बदलते दौर और घटते दर्शकों की संख्या के कारण आखिरकार इस सिनेमा हॉल के दिन लद गए। करीब 5 साल पहले इस हॉल के दरवाजे दर्शकों के लिए हमेशा के लिए बंद हो गए। हालांकि, अब इस इमारत का स्वरूप बदल चुका है। जो जगह कभी एक्शन और गानों से गूंजा करती थी, वहां अब शिक्षण कार्य हो रहा है। आज इस इमारत में कई कोचिंग संस्थान चल रहे हैं, जहां सैकड़ों बच्चे अपने भविष्य को संवारने की पढ़ाई कर रहे हैं।

शहर में अब सिनेमा का अभाव

पुराने सिनेमाघरों के बंद होने से जहानाबाद के निवासियों को मनोरंजन के लिए अब दूसरे शहरों पर निर्भर होना पड़ रहा है। जिले में अब कोई भी मल्टीप्लेक्स या सिनेमा हॉल न होने के कारण स्थानीय लोग फिल्म देखने के लिए पटना या फिर गयाजी का रुख करते हैं। आज भी लोगों को डॉल्बी साउंड और बड़े पर्दे का अनुभव लेने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। यह बदलाव तकनीक की प्रगति और बदलती जीवनशैली का एक जीता-जागता उदाहरण है, जिसने शहर के पुराने सांस्कृतिक ठिकानों को एक नई पहचान दे दी है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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