बेरोजगारी से तंग आकर शुरू किया मधुमक्खी पालन, आज हर साल 250 क्विंटल शहद का उत्पादन कर कमा रहे हैं लाखों बिहार एक महीने पहले 67
जहानाबाद के संतोष कुमार केसरी ने ग्रेजुएशन के बाद नौकरी न मिलने पर मधुमक्खी पालन को अपना पेशा बनाया। आज वे सैकड़ों बॉक्स के जरिए भारी मात्रा में शहद उत्पादन कर रहे हैं और आत्मनिर्भर बन गए हैं।

ग्रेजुएशन के बाद बदली किस्मत

बिहार के जहानाबाद जिले में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय तेजी से नई ऊंचाइयों को छू रहा है। स्थानीय स्तर पर लोग अब खेती के पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर इस स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। काको प्रखंड के नदियांवा गांव में रहने वाले संतोष कुमार केसरी की कहानी ऐसे ही युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो डिग्री पूरी करने के बाद भी रोजगार की तलाश में भटक रहे थे। संतोष ने स्नातक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन उन्हें मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली। कुछ समय तक इधर उधर छोटे मोटे काम करने के बाद उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी और मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में भाग्य आजमाया।

प्रशिक्षण और 10 बक्सों से शुरुआत

संतोष कुमार ने अपना सफर मात्र 10 बक्सों के साथ शुरू किया था। शुरुआत में उन्हें काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एक परिचित व्यक्ति की सलाह पर उन्होंने गंधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जाकर मधुमक्खी पालन का विधिवत प्रशिक्षण लिया। वर्ष 2019 में जब उन्होंने इस व्यवसाय को आधिकारिक रूप से शुरू किया, तो उनके पास सीमित संसाधन थे। हालांकि, समय के साथ उनकी मेहनत रंग लाई। बाद में आत्मा जहानाबाद के सहयोग से उन्हें 50 अतिरिक्त बॉक्स उपलब्ध कराए गए, जिससे उनके काम को गति मिली।

400 बक्सों का बड़ा साम्राज्य

निरंतर मेहनत और सही प्रबंधन का ही नतीजा है कि संतोष कुमार आज 400 बक्सों के मालिक हैं। उनका सफर 10 बक्सों से शुरू होकर 400 तक पहुंच गया है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, वे सालाना लगभग 240 क्विंटल शहद का उत्पादन कर रहे हैं। इस व्यवसाय से उन्हें हर महीने 40,000 रुपये तक की शानदार कमाई हो रही है। जिले में अब करीब 200 परिवार मधुमक्खी पालन के व्यवसाय से जुड़कर अपनी आजीविका चला रहे हैं, जो क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

बाजार और सरकारी सब्सिडी की स्थिति

मधुमक्खी पालन के इस व्यवसाय को सरकार का भी बड़ा समर्थन मिल रहा है। बाजार में एक बॉक्स की कीमत करीब 4,000 रुपये होती है, लेकिन सरकारी योजनाओं के तहत इच्छुक किसानों को 70 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। इस छूट के बाद एक बॉक्स मात्र 1,200 रुपये में उपलब्ध हो जाता है। यदि मधुमक्खी पालन की प्रक्रिया को सही ढंग से संभाला जाए, तो एक बक्से से साल भर में लगभग 60 किलो शहद प्राप्त किया जा सकता है। इसी हिसाब से संतोष कुमार आज बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं।

भंडारण की चुनौती और भविष्य की राह

संतोष केसरी ने बताया कि शहद की कीमतों में उतार चढ़ाव बना रहता है। खुदरा बाजार में शहद 500 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है, जबकि व्यापारियों को बेचने पर 150 रुपये और थोक भाव में 300 रुपये प्रति किलो के आसपास दाम मिलते हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर भंडारण की व्यवस्था न होने के कारण कई बार किसानों को अपना माल कम कीमतों पर बेचना पड़ता है। यदि उनके पास कोल्ड स्टोरेज या शहद रखने की उचित जगह हो, तो वे इसे स्टोर करके बाजार में बेहतर कीमतों पर बेच सकते हैं। फिलहाल संतोष अपनी मेहनत के दम पर एक सफल उद्यमी बनकर गांव के अन्य युवाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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